Friday, April 13, 2012

आखिर हम मार्क्स और लेनिन को क्यों पढ़े?

आखिर हम मार्क्स और लेनिन को क्यों पढ़े? पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा बंगाल से मार्क्सवाद ही नहीं मार्क्स और लेनिन की विदाई भी उनके साहस का एक और सबूत है। वामपंथियों का मार्क्स, लेनिन और अन्य कम्युनिष्ट नेताओं के प्रति कितना दुराग्रह है इसकी झलक सन् २०११ में त्रिपुरा राज्य में देखने को मिली। यहां की कम्युनिष्ट सरकार ने कक्षा पांच के सिलेबस से सत्य-अंहिसा के पुजारी महात्मा गांधी की जगह घोर कम्युनिस्ट, फासीवादी, जनता पर जबरन कानून लादने वाले लेनिन (ब्लाडिमिर इल्या उल्वानोव) को शामिल किया है। भारतीय संदर्भ में जहां-जहां वामपंथी ताकत में रहे शिक्षा का सत्यानाश होता रहा। शिक्षा व्यवस्था में सेंध लगाकर ये भारतीयों के मानस पर कब्जा करने का षड्यंत्र रचते रहे हैं।


केरल के कई उच्च शिक्षित नागरिकों को विश्व शांति का मंत्र देने वाले महात्मा गांधी और अयांकलि के समाज सुधारक श्रीनारायण गुरु सहित अन्य स्वदेशी विचारकों के संदर्भ में उचित जानकारी नहीं होगी। क्योंकि केरल की कम्युनिष्ट पार्टी ने वहां स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रमों में इन्हें स्थान ही नहीं दिया। बल्कि उन्होंने जबकि मार्क्सवादी संघर्ष से किताबों पन्ने काले कर दिए। केरल के ही महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के एमए राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम में भारतीय राजनीतिक विचारधारा में गांधीजी, वीर सावरकर और श्री अरविन्दों को हटाया गया, इनकी जगह मार्क्सवादी नेताओं को रखा गया।
पत्रकार और सांसद अरुण शौरी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एमिनेण्ट हिस्टोरियन्स' में 'शुद्धो-औशुद्धो' के संदर्भ में पश्चिम बंगाल के अध्यादेश का उदाहरण दिया है। यह अध्यादेश १९८९ को हायर सेकण्डरी स्कूलों को जारी किया गया था। इसमें इतिहास की पाठ्य पुस्तकों के लेखकों और प्रकाशकों कहा गया था कि उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तक औशुद्ध (गलतियां) हो तो वे आगामी संस्करण में उन्हें ठीक कर लें। एक लम्बी सूची भी दी गई जिसमें बताया गया कि क्या-क्या गलत है और उसमें क्या संसोधन करना है। इस तरह पश्चिम बंगाल ने कम्युनिष्टों ने मनमाफिक भारत के इतिहास में फेरबदल किया। पश्चिम बंगाल में लम्बे समय तक कम्युनिष्ट सरकार रही। इस दौरान उन्होंने जबर्दस्त तरीके से शिक्षा व्यवस्था में घुसपैठ की। इसके चलते पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, केरल के प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक के अधिकांश शिक्षक, शिक्षक होकर माकपा के सक्रिय कार्यकर्ता अधिक रहे हैं। वामपंथियों की मंशानुरूप ये शिक्षक इतिहास, भूगोल, साहित्य सहित अन्य विषयों को तोड़-मड़ोरकर प्रस्तुत करते रहे हैं। वामपंथियों ने अपनी थोथी राजनीति की दुकान चलाने के लिए शिक्षा व्यवस्था को तो जार-जार किया ही इसके माध्यम से राष्ट्रीय भावना को भी तार-तार किया। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था में ममता सरकार की ओर से किए जा रहे सार्थक प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए।
वर्षों से कम्युनिष्टों ने जो गड़बडिय़ां की, उन्हें ठीक किया ही जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने कक्षा ११वी और १२वी के इतिहास के सिलेबस में बदलाव करने का फैसला लिया है। सिलेबस बनाने वाली कमेटी की ओर से तैयार किए गए नए प्रारूप में पुराने अध्यायों को हटाया गया है। हटाए जाने वालों में मार्क्स और लेनिन के अध्याय भी हैं। पाठ्यक्रम तैयार करने वाली कमेटी के चेयरमैन अभिक मजूमदार ने बताया कि इतिहास में ऐसे कई अध्याय हैं जिन्हें किताबों में बेवजह शामिल किया गया था, जबकि इनकी कोई जरूरत नहीं है। इन्हें हटाने की सिफारिश की गई है। उन्होंने कहा कि जब चीन का इतिहास पाठ्क्रम में शामिल है तो अलग से मार्क्स और लेनिन को पढऩे की जरूरत क्या है? नए प्रारूप में महिला आंदोलन, हरित क्रान्ति और पर्यावरण से जुड़े अध्याय शामिल हैं। मजूमदार ने बताया कि हमने किसी विषय को जबरन थोपने की कोशिश नहीं की है।
चालाक कम्युनिष्टों ने भारत में मार्क्स, लेनिन अन्य वामपंथी विचारकों को पढ़ाने में भी ईमानदारी नहीं दिखाई। वामपंथ का पूरा सच भारत के कम्युनिष्टों ने कभी नहीं पढ़ाया। वामपंथ का साफ-सुथरा और लोक-लुभावन चेहरा ही प्रस्तुत किया गया। कम्युनिष्ट माक्र्सवाद के पीछे छिपा अवैज्ञानिकवाद, फासीवाद, अधिनायकवाद, हिंसक चेहरा कभी सामने लेकर नहीं आए। इससे वे हमेशा कन्नी काटते नजर आए। कम्युनिष्टों ने कभी नहीं पढ़ाया या स्वीकार किया कि रूस में लेनिन और स्टालिन, रूमानिया में चासेस्क्यू, पोलैंड में जारू जेलोस्की, हंगरी में ग्रांज, पूर्वी जर्मनी में होनेकर, चेकोस्लोवाकिया में ह्मूसांक, बुल्गारिया में जिकोव और चीन में माओ-त्से-तुंग ने किस तरह नरसंहार मचाया। इन अधिनायकों ने सैनिक शक्ति, यातना-शिविरों और असंख्य व्यक्तियों को देश-निर्वासन करके भारी आतंक का राज स्थापित किया। मार्क्सवादी रूढि़वादिता ने कंबोडिया में पोल पॉट के द्वारा वहां की संस्कृति के विद्वानों मौत के घाट उतार दिया गया। जंगलों और खेतों में उन्हें मार गिराया गया। रूस और मध्य एशिया के गणराज्यों में भी हजारों गिरजाघरों और मस्जिदों को बंद कर दिया गया। स्टालिन के कारनामों से माक्र्सवाद का खूनी चेहरा जग-जाहिर हुआ।
हालांकि इन फासीवादी ताकतों को धूल में मिलाने में जनता ने अधिक समय नहीं लगाया। जल्द ही उक्त देशों से कम्युनिज्म उखाड़ फेंका गया। रूस में तो लेनिन और स्टालिन के शवों को बुरी तरह पीटा गया। इतना ही नहीं वहां कि जनता ने उन सब चीजों को बदलने का प्रयास किया जिन पर कम्युनिज्म ने अपना ठप्पा लगा दिया था। इतिहास की पुस्तकों से वे पन्ने निकाल दिए गए, जो कम्युनिष्ट के काले रंग से रंगे थे। सेंट पीटर्सबर्ग नगर कम्युनिष्टों के शासनकाल में 'लेनिनग्राड' हो गया था। कम्युनिज्म के ध्वस्त होते ही लेनिनग्राड वापिस सेंट पीटर्सबर्ग हो गया। भारत में भी समय-समय पर अपना रंग दिखाया है। महात्मा गांधी के आंदोलन भारत छोड़ो के खिलाफ षड्यंत्र किए, अंग्रेजों का साथ दिया, कम्युनिष्टों ने सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिन्द फौज के खिलाफ दुष्प्रचार किया, पाकिस्तान बनाने की मांग को वैध करने और भारत में अनेक स्वायत्त राष्ट्र बनाने का समर्थन किया। १९६२ के युद्ध में चीन की तरफदारी की, क्योंकि वहां कम्युनिष्ट सरकार थी। कम्युनिष्टों के लिए सदैव राष्ट्रहित से बढक़र स्वहित रहे हैं। कम्युनिष्टों ने भारत की संस्कृति, राष्ट्रीय चरित्रों, राष्ट्रीय आदर्शों और परम्पराओं से नफरत करना सिखाया। मार्क्स, लेनिन, माओ, फिदेल कास्त्रो, चे ग्वारा  सबके सब उनके लिए आदर्श बने रहे, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. हेडगेवार सभी बुर्जुआ, पुनरुत्थानवादी कहे जाते रहे। कितनी बेशर्मी से कम्युनिष्ट इस देश में रहकर ही इस देश के महापुरुषों को दरकिनार करते रहे और विदेश से प्रेरणा लेते रहे। ऐसे कम्युनिज्म को तो इस देश से खुरच-खुरच कर बाहर फेंक देना चाहिए।
जिस कम्युनिज्म की अर्थी उसके जन्म स्थान से ही उठ गई, उसे भारत में दुल्हन की तरह रखा गया। रूस में मार्क्सवाद का प्रारंभ भीषण नरसंहार, नागरिकों की हत्याओं, दमन और सैनिक गतिविधियों से हुआ। १९९१ में इसका अंत व्यापक भ्रष्टाचार, आर्थिक कठिनाइयों और देशव्यापी भुखमरी के रूप में हुआ। ऐसे कम्युनिज्म का भारत में बने रहने का कोई मतलब नहीं है। ममता बनर्जी की तरह औरों को भी आगे आना होगा। साथ ही इस तरह के सुधारों का स्वागत किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं अगर किसी भी स्तर पर वामपंथियों की ओर से विरोध जताया जाता है तो उसका सबको मिलकर मुकाबला करना चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Wednesday, March 28, 2012

सोनिया गांधी का करोड़ों रुपये का काला धन स्विस बैंक में!

  सोनिया गांधी का करोड़ों रुपये का काला धन स्विस बैंक में! रुसी खुफिया एजेंसी ने भी अपने दस्‍तावेजों में लिखा है कि रुस के साथ हुए सौदा में राजीव गांधी को अच्‍छी खासी रकम मिली थी, जिसे उन्‍होंने स्विस बैंके अपने खातों में जमा करा दिया था. पूर्व केन्‍द्रीय मंत्री एवं वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता राम जेठमलानी भी सोनिया गांधी और उनके परिवार के पास अरबों का काला धन होने का आरोप लगा चुके हैं. तो क्‍या केंद्र सरकार इसलिए भ्रष्‍टाचार और काले धन के मुद्दे को इसलिए गंभीरता से नहीं ले रही है कि सोनिया गांधी का काला धन स्विस बैंक जमा है? क्‍या केंद्र सरकार अन्‍ना हजार और रामदेव के साथ यह रवैया यूपीए अध्‍यक्ष के इशारे पर अपनाया गया था? क्‍या केन्‍द्र सरकार देश को लूटने वालों के नाम इसलिए ही सार्वजनिक नहीं करना चाहती है? क्‍या इसलिए काले धन को देश की सम्‍पत्ति घोषित करने की बजाय सरकार इस पर टैक्‍स वसूलकर इसे जमा करने वालों के पास ही रहने देने की योजना बना रही है? ऐसे कई सवाल हैं जो इन दिनों लोगों के जेहन में उठ रहे हैं. काला धन देश में वापस लाने के मुद्दे पर बाबा रामदेव के आंदोलन से पहले सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र सरकार की खिंचाई कर चुकी है. विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाले भारतीयों के नाम सार्वजनिक किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीते 19 जनवरी को सरकार की जमकर खिंचाई की थी. सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक पूछ लिया था कि आखिर देश को लूटने वालों का नाम सरकार क्‍यों नहीं बताना चाहती है? इसके पहले 14 जनवरी को भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा था. पर सरकार कोई तार्किक जवाब देने की बजाय टालमटोल वाला रवैया अपनाकर बच निकली. केंद्र सरकार के इस ठुलमुल रवैये एवं काले धन संचयकों के नाम न बताने की अनिच्‍छा के पीछे गांधी परिवार का स्विस खाता हैं. इस खाता को राजीव गांधी ने खुलवाया था. इसमें इतनी रकम जमा है कि कई सालों तक मनरेगा का संचालन किया जा सकता है. यह बात कही थी एक स्विस पत्रिका ने. 'Schweizer Illustrierte' ( http://www.schweizer-illustrierte.ch/ ) नामक इस पत्रिका ने अपने एक पुराने अंक में प्रकाशित एक खोजपरक रिपोर्ट में राजीव गांधी का नाम भी शामिल किया था. पत्रिका ने लिखा था कि तीसरी दुनिया के तेरह नेताओं के साथ राजीव गांधी का खाता भी स्विस बैंक में हैं. यह कोई मामूली पत्रिका नहीं है. बल्कि यह स्विट्जरलैंड की प्रतिष्ठित तथा मशहूर पत्रिका है. इस पत्रिका की 2 लाख 15 हजार से ज्‍यादा प्रतियां छपती हैं तथा इसके पाठकों की खंख्‍या 9 लाख 25 हजार के आसपास है. इसके पहले राजीव गांधी पर बोफोर्स में दलाली खाने का आरोप लग चुका है. डा. येवजेनिया एलबर्टस भी अपनी पुस्‍तक 'The state within a state - The KGB hold on Russia in past एंड future' में इस बात का खुलाया किया है कि राजीव गांधी और उनके परिवार को रुस के व्‍यवसायिक सौदों के बदले में लाभ मिले हैं. इस लाभ का एक बड़ा भाग स्विस बैंक में जमा किया गया है. रुस की जासूसी संस्‍था केजीबी के दस्‍तावेजों में भी राजीव गांधी के स्विस खाते होने की बात है. जिस वक्‍त केजीबी दस्‍तावेजों के अनुसार राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी अपने अवयस्‍क लड़के (जिस वक्‍त खुलासा किया गया था, उस वक्‍त राहुल गांधी वयस्‍क नहीं थे) के बदले संचालित करती हैं. इस खाते में 2.५ बिलियन स्विस फ्रैंक है, जो करीब 2.2 बिलियन डॉलर के बराबर है. यह 2.2 बिलियन डॉलर का खाता तब भी सक्रिय था, जब राहुल गांधी जून 1998 में वयस्‍क हो गए थे. अगर इस धन का मूल्‍यांकन भारतीय रुपयों में किया जाए तो उसकी कीमत लगभग 10, 000 करोड़ रुपये होती है. इस रिपोर्ट को आए काफी समय हो चुका है, फिर भी गांधी परिवार ने कभी इस रिपोर्ट का औपचारिक रूप से खंडन नहीं किया और ना ही इसके खिलाफ विधिक कार्रवाई की बात कही. आपको जानकारी दे दें कि स्विस बैंक अपने यहां जमा धनराशि का निवेश करता है, जिससे जमाकर्ता की राशि बढ़ती रहती है. अगर केजीबी के दस्‍तावेजों के आधार पर गांधी परिवार के पास मौजूद धन को अमेरिकी शेयर बाजार में लगाया गया होगा तो यह रकम लगभग 12,71 बिलियन डॉलर यानी लगभग 48, 365 करोड़ रुपये हो चुका होगा. यदि इसे लंबी अवधि के शेयरों में निवेश किया गया होगा तो यह राशि लगभग 11. २१ बिलियन डॉलर होगी जो वर्तमान में लगभग 50, 355 करोड़ रुपये हो चुकी होगी. साल 2008 में आए वैश्विक आर्थिक मंदी के पहले यह राशि लगभग 18.66 बिलियन डॉलर यानी 83 हजार 700 करोड़ के आसपास हो चुकी होगी. वर्तमान स्थिति में गांधी परिवार के पास हर हाल में यह काला धन 45,000 करोड़ से लेकर 84, 000 करोड़ के बीच होगा. चर्चा है कि सकरार के पास ऐसे पचास लोगों की सूची आ चुकी है, जिनके पास टैक्‍स हैवेन देशों में बैंक एकाउंट हैं. पर सरकार ने अब तक मात्र २६ लोगों के नाम ही अदालत को सौंपे हैं. एक गैर सरकारी अनुमान के अनुसार 1948 से 2008 तक भारत अवैध वित्तीय प्रवाह (गैरकानूनी पूंजी पलायन) के चलते कुल २१३ मिलियन डालर की राशि गंवा चुका है. भारत की वर्तमान कुल अवैध वित्तीय प्रवाह की वर्तमान कीमत कम से कम 462 बिलियन डालर के आसपास आंकी गई है, जो लगभग २० लाख करोड़ के बराबर है, यानी भारत का इतना काला धन दूसरे देशों में जमा है. यही कारण बताया जा रहा है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट से बराबर लताड़ खाने के बाद भी देश को लूटने वाले का नाम उजागर नहीं कर रही है. कहा जा रहा है कि इसी कारण बाबा रामदेव का आंदोलन एक रात में खतम करवा दिया गया तथा इसके पहले उन्‍हें इस मुद्दे पर मनाने के लिए चार-चार मंत्री हवाई अड्डे पर अगवानी करने गए. सरकार इसके चलते ही इस मामले की जांच जेपीसी से नहीं करवानी चा‍हती. इसके चलते ही भ्रष्‍टाचार के मामले में आरोपी थॉमस को सीवीसी यानी मुख्‍य सतर्कता आयुक्‍त बनाया गया, ताकि मामले को सामने आने से रोका जा सके. यह २G से पहले की रिपोर्ट बनायीं थी.... अमेरिकी वेबसाइट ' बिजनेस इनसाइडर ' ने दुनिया के सबसे रईस राजनेताओं की लिस्ट जारी की है। इस मैग्जीन को विश्व मे बहुत ही प्रतिष्ठा प्राप्त है .. यह दावा किया है अमेरिका के एक मीडिया हाउस ने। इसका कहना है कि यूपीए अध्‍यक्ष के पास 10 हजार से 45 हजार करोड़ के बीच (2 से 19 अरब डॉलर) की संपत्ति है। इसमें कांग्रेस अध्यक्ष को चौथे नंबर पर रखा है। इस लिस्ट में हरियाणा की विधायक और जिंदल समूह की प्रमुख सावित्री जिंदल का नाम भी है। साइट के मुताबिक, कांग्रेस अध्यक्ष की संपत्ति यानी 10 हजार से 45 हजार करोड़ के बीच हो सकती है। इससे पहले जर्मनी के अखबार 'डी वेल्ट' में भी इस बारे में खबर छपी थी। इस अखबार के वर्ल्ड्स लग्जरी गाइड सेक्शनमें दुनिया के सबसे रईस 23 नेताओं की लिस्ट छापी गई थी। उसमें भी सोनिया गांधी चौथे स्थान पर हैं। 'बिजनेस इनसाइडर' ने वर्ल्ड्स लग्जरी गाइड का हवाला देते हुए लिस्‍ट छापी है। लेकिन सबसे नीचे यह भी लिखा गया है कि यह रिपोर्ट OpenSecrets.org , Forbes.com, Bloomberg.com, Wikipedia.org, Guardian.co.uk से मिली जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। लिस्ट में अहम नाम 1. अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अजीज शाह, सऊदी अरब 2. हसनल बोलखेह सुल्तान, ब्रुनेई 3. माइकल ब्लूमबर्ग मेयर, न्यूयॉर्क 4. सोनिया गांधी 6. व्लादीमिर पुतिन 7. सावित्री जिंदल 19. आसिफ अली जरदारी सोनिया गांधी से हाल ही में एक आरटीआई कार्यकर्ता ने उनके आयकर रिटर्न का ब्‍यौरा मांगा था, लेकिन उन्‍होंने इसे निजी जानकारी बता कर सार्वजनिक करने से मना कर दिया था। लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी ने अपनी कुल संपत्ति 1.38 करोड़ रुपये की बताई थी। ऐसे में अमेरिकी वेबसाइट पर दिया गया ब्‍यौरा जमीन-आसमान का अंतर दर्शाता है। इसलिए इस साइट पर कांग्रेस या सोनिया की ओर से प्रतिक्रिया का इंतजार है और संभावना यह भी है कि सोनिया वेबसाइट के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करें। देश को क़र्ज़ में डुबो कर हमारे पैसों से विदेशों में मजे लूट रही है ये और कहती है की मेरे पास सिर्फ एक करोड़ अडतीस लाख रूपये हैं तो फिर ये क्या है ???

Monday, March 5, 2012

पुरुष को गठरी बना ले चलने में सक्षम हो नारी

राममनोहर लोहिया
प्रख्यात चिंतक राममनोहर लोहिया का कहना था कि भारतीय नारी द्रौपदी जैसी हो, जिसने कभी भी किसी पुरुष से दिमागी हार नहीं खाई। 

हिंदुस्तान के लोग दुनिया के सबसे ज्यादा उदास लोग हैं, क्योंकि वे दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब और बीमार लोग हैं। एक और उतना ही बड़ा कारण यह भी है कि उनके मन में, खासकर इतिहास के पिछले काल में, खास तरह का झुकाव आ गया। 

वे दुनिया से अलग रहने का एक दर्शन मानते हैं, जो तर्क में और अंतर्दृष्टि में बहुत ऊंचा है, लेकिन व्यवहार में वे जिंदगी से बुरी तरह चिपके रहते हैं। जिंदगी से उनका मोह इतना ज्यादा होता है कि किसी कोशिश में अपने को खतरे में डालने की बजाय, गरीबी और कष्ट की बुरी हालत में पड़े रहना पसंद करते हैं। और शक्ति के लोभ का प्रदर्शन इनसे ज्यादा दुनिया में कहीं और नहीं होता।

मुझे यकीन है कि वर्णो और स्त्रियों के कटघरे आत्मा के इस पतन के लिए बुनियादी तौर पर जिम्मेदार हैं। इन कटघरों में इतनी ताकत है कि ये जोखिम उठाने और खुशी हासिल करने की सारी ताकत को खत्म कर दें। जो लोग समझते हैं कि आधुनिक आर्थिक ढांचे के जरिए गरीबी मिट जाने पर ये कटघरे अपने आप टूट जाएंगे, वे बहुत बड़ी गलती करते हैं। गरीबी और ये कटघरे एक-दूसरे के पैदा हुए कीड़ों पर पलते हैं। 

देश की सारी राजनीति में राष्ट्रीय सहमति का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, चाहे जानबूझ कर या परंपरा से, कि शूद्रों और औरतों को, जो हमारी आबादी का तीन-चौथाई भाग हैं, दबा कर और राजनीति से अलग रखा जाए। 

स्त्रियों की समस्या मुश्किल है, इसमें कोई शक नहीं। उनकी रसोई, बुरी तरह धुआं देने वाले चूल्हों की गुलामी बहुत ही बुरी है। उसे खाना बनाने का एक निश्चित समय मिलना चाहिए। उसे भुखमरी और बेकारी के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में हिस्सा तो लेना ही चाहिए, लेकिन उसकी समस्या और भी आगे जाती है।

माता-पिताओं ने आंखों में आंसू भरकर मुझे बताया है कि अगर दहेज की पूरी रकम देने में कुछ कठिनाई हो, तो उनकी लड़कियों से किस तरह बुरा बर्ताव किया जाता है और कभी-कभी मार तक डाला जाता है। जिस तरह खेती में कभी-कभी मेहनत करने की बजाय, खेत पट्टे पर उठा देने में ज्यादा लाभ होता है, उसी तरह कम पढ़ी-लिखी लड़की ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की से अच्छी होती है, क्योंकि उसका दहेज कम होता है। 

दहेज लेने और देने पर सजा तो मिलनी ही चाहिए, लेकिन लोगों के दिमाग और उनकी मान्यताओं को भी बदलना होगा। तस्वीर दिखाकर या एक सिमटती हुई छाया के हाथों लाए गए चाय के प्याले के वातावरण में शादी तय करने का तरीका नाई व ब्राह्मण के जरिए शादी तय कराने के पुराने तरीके से भी ज्यादा वाहियात है। यह ऐसा है कि घोड़े को खरीदते समय उसे देखे तो, लेकिन न उसके खुर छू सके, न दांत देख सके। 

कोई बीच का रास्ता नहीं है। हिंदुस्तान को अपना पुराना पौरुष फिर से हासिल करना होगा, यानी दूसरे शब्दों में, उसे आधुनिक बनना होगा। लड़की की शादी करना माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं, उनकी जिम्मेदारी अच्छी सेहत और अच्छी शिक्षा देने पर खत्म हो जाती है। 

मेरा विश्वास है कि हर पति-पत्नी की, जिनके तीन बच्चे हो चुके हों, प्रजनन शक्ति नष्ट कर देनी चाहिए और प्रजनन शक्ति नष्ट करने या कम से कम गर्भनिरोध की सुविधाएं हर ऐसे स्त्री व पुरुष को उपलब्ध होनी चाहिए, जो बच्चे न पैदा करना चाहते हों। 

ब्रह्मचर्य आमतौर पर एक कैद होती है। ऐसी कैद-आत्माओं से किसकी भेंट नहीं होती, जिनका कौमार्य उन्हें बांधे रहता है और जो उत्सुकता से अपने को मुक्त करने वाले का इंतजार करती हैं? 

अब समय है कि युवक और युवतियां इस तरह के बचपने के खिलाफ विद्रोह करें। उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए कि यौन-संबंधों में सिर्फ दो अक्षम्य अपराध हैं : बलात्कार और झूठ बोलना या वादा तोड़ना। एक तीसरा अपराध दूसरे को चोट या पीड़ा पहुंचाना भी है, जिससे जहां तक मुमकिन हो, बचना चाहिए।

आज वर्ण और योनि के इन दो कटघरों को तोड़ने से बड़ा कोई पुण्य नहीं। युवक और युवतियां सिर्फ इतना ही याद रखें कि चोट या पीड़ा न पहुंचाएं और गंदे न हों, क्योंकि स्त्री और पुरुष का रिश्ता बड़ा नाजुक होता है। 

आज के हिंदुस्तान में एक मर्द और एक औरत शादी करके जो सात-आठ बच्चे पैदा करते हैं, उनके बनिस्बत मैं उनको पसंद करूंगा, जो बिना शादी किए एक भी नहीं या एक ही पैदा करते हैं। या, लड़की यानी उसके मां-बाप दहेज देकर, जिसे समाज कहेगा अच्छी-खासी शादी की, उसको मैं ज्यादा खराब समझूंगा, बनिस्बत एक ऐसी लड़की के, जो कि दहेज दिए बिना दुनिया में आत्म-सम्मान के साथ चलती है। 

मर्द कुछ भी करें, हिंदुस्तान में उनकी निंदा नहीं होती, लेकिन औरतों की निंदा हो जाती है। संसार में सभी जगह थोड़ा-बहुत ऐसा है। यह वृत्ति भी छूट जानी चाहिए। और खासतौर से राजनीति में जो औरतें आएंगी, वे तो थोड़ी-बहुत तेजस्वी होंगी, घर की गुड़िया तो नहीं होंगी। जब वह तेजस्वी होगी, तो जो परंपराग्रस्त संस्कार हैं, उनसे टकराव हो ही जाएगा। आज के हिंदुस्तान में किसी औरत की निंदा तो करनी ही नहीं चाहिए। केवल जहां तक विचार का संबंध है, उसमें भी, मैं समझता हूं, बहुत संभल कर उसके बारे में कुछ बोलना चाहिए।

भारतीय नारी द्रौपदी जैसी हो, जिसने कि कभी भी किसी पुरुष से दिमागी हार नहीं खाई। नारी को गठरी के समान नहीं बनाना है, परंतु नारी इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए कि वक्त पर पुरुष को गठरी बनाकर अपने साथ ले चले। 
(लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित ‘लोहिया के विचार’ से संपादित अंश, साभार) लेखक क्रांतिकारी, प्रख्यात चिंतक, विचारक, राजनीतिज्ञ है।

Monday, February 27, 2012

रहस्यमय हैं सोनिया गांधी...

रहस्यमय हैं सोनिया गांधीराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आरोप लगाया है कि संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी कांग्रेस की आपातकालीन मानसिकता, निरकुंश और अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं और इसी के तहत उन्होंने अलोकतांत्रिक तरीके से राष्ट्रीय सलाहाकार परिषद नाम से समानांतर सत्ता केंद्र खड़ा कर दिया है। उसने आरोप लगाया कि इसी मानसिकता के चलते वह देश की जनता से अपने धर्म, बीमारी और आयकर संबंधी जानकारी भी छिपाती आ रही हैं।


संघ के हिन्दी और अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाले मुखपत्रों ‘पांचजन्य’ तथा ‘ऑर्गेनाइजर’ के ताजा अंकों में सोनिया पर ये आरोप लगाए गए हैं। पांचजन्य के संपद्कीय में कहा गया है कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद नामक समानांतर सत्ता केन्द्र के जरिए कि सोनिया साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक जैसे काले कानून का प्रारूप तैयार कराके विधायी प्रक्रिया में असंवैधानिक हस्तक्षेप करने जैसी हिमाकत कर रही हैं। इसमें सवाल किया गया है कि क्या देश कांग्रेस की जागीर है जो उसके राजनीतिक हितों, सत्ता स्वार्थों व मंसूबों के हिसाब से चलाया जाएगा?
उधर ऑर्गेनाइजर के लेख में कांग्रेस अध्यक्ष पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया गया है कि सोनिया अपने सार्वजनिक जीवन को लेकर बहुत अधिक रहस्यात्मक हैं। इसमें कहा गया है कि सोनिया गांधी ने पहले अपने धर्म को छिपाया, फिर संबंधियों को छिपाया और अब अपनी बीमारी को। वह लगातार इन सब जानकारियों को देश की जनता से छिपाती आ रही हैं।
लेख में कहा गया है कि इस छिपाने और गोपनीयता बरतने की कांग्रेस अध्यक्ष की आदत का सबसे ताजा उदाहरण पिछले दस साल की अपनी आय कर की जानकारी देने से इंकार करना है।
आर्गेनाइजर में दावा किया गया है कि सोनिया ने निजिता और सुरक्षा के नाम पर उनके द्वारा पिछले दस सालों में दिए गए आयकर की जानकारी देने से इंकार कर दिया। इसमें कहा गया है कि इससे पहले उन्होंने अपने धर्म की जानकारी देने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि यह उनका निजी मामला है जिसे वह सार्वजनिक नहीं करना चाहेंगी। इसमें कहा गया कि सभी सरकारी कागजातों और फार्मों में यह जानकारी देना अनिवार्य होने के बावजूद सोनिया इससे बचती आई। संघ ने दावा किया है कि कांगे्रेस अध्यक्ष ने अपनी शैक्षणिक योग्यता को भी  कि अति गोपनीय बना कर छिपाया हुआ है। हाल ही में उनकी बीमारी और विदेश में उपचार के संदर्भ में लेख में कहा गया है कि सोनिया जब अस्वस्थ हुई और कथित तौर पर सरकारी खर्चे पर उपचार के लिए विदेश गईं तो भी ‘निजता का सम्मान’ किए जाने के नाम पर उन्होंने बीमारी के बारे में देश को कुछ भी बताने से इंकार कर दिया।
इसमें कहा गया है कि अगर उनके उपचार पर सरकारी धन खर्च हुआ है तो देश की जनता को यह जानने का हक है कि इसमें कितना सार्वजनिक धन लगा और क्यों लगा। जनता को यह जानने का भी अधिकार है कि जिस भी बीमारी का उपचार कराने वह विदेश गई, क्या उसके इलाज की सुविधा देश में नहीं थी?

प्रदेश महासचिव कुलजीत चहल पर पार्टी और वरिष्ठ नेताओं की छवि धूमिल करने के गंभीर आरोप

प्रदेश महासचिव कुलजीत चहल पर प्रदेश महासचिव कुलजीत चहल पार्टी और वरिष्ठ नेताओं की छवि धूमिल करने के गंभीर आरोप बीते 20 साल से सत्ता का बनवा...