Thursday, December 27, 2018

प्रदेश महासचिव कुलजीत चहल पर पार्टी और वरिष्ठ नेताओं की छवि धूमिल करने के गंभीर आरोप

प्रदेश महासचिव कुलजीत चहल पर
प्रदेश महासचिव कुलजीत चहल
पार्टी और वरिष्ठ नेताओं की छवि धूमिल करने के गंभीर आरोप

बीते 20 साल से सत्ता का बनवास झेल रही दिल्ली प्रदेश भारतीय जनता पार्टी में एक बार फिर बवाल शुरू हो गया है। पार्टी के कुछ महत्वाकांक्षी नेता शीर्ष नेतृत्व के सामने अपनी छवि बनाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की छवि को ही दांव पर नहीं लगा रहे बल्कि पार्टी और आला नेतृत्व की साख को भी खत्म करने में जुटे हैं। ताजा मामला बीते रविवार 23 दिसंबर को राजधानी के इंदिरा गांधी स्टेडियम में हुए बूथ अध्यक्षों के सम्मेलन से जुड़ा है। इस सम्मेलन को खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने संबांधित किया था और इसमें पार्टी के वरिष्छ नेता शामिल हुए थे। आने वाले समय में दिल्ली प्रदेश भाजपा महामंत्री कुलजीत चहल की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। चहल पर आरोप है कि उन्होंने हाल ही में हुए बूथ अध्यक्ष सम्मेलन पर पूरी तरह से कब्जा जमा लिया और इस सम्मेलन के लिए पिछले डेढ़ साल से मेहनत में जुटे पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों को कोई अहमियत नहीं दी।

बूथ प्रबंधन अध्यक्ष को मंच पर नहीं चढ़ने दिया
                                                                   धर्मवीर सिंह

जिस भाजपा नेता के नेतृत्व और कुल 11 सदस्यों की टीम ने पिछले डेढ़ साल की मेहनत के बाद भाजपा के बूथ सम्मेलन को इस स्तर तक पहुंचाया, पूरे कार्यक्रम के दौरान उनका नाम ही नहीं लिया गया। 23 दिसंबर को हुए दिल्ली भाजपा के बूथ अध्यक्षों के सम्मेलन में मंच पर बूथ प्रबंधन समिति के अध्यक्ष को ही जगह नहीं मिली। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने इस बूथ अध्यक्षों के सम्मेलन के संयोजन की जिम्मेदारी प्रदेश महामंत्री कुलजीत चहल को सोंपी थी। खास बात है कि इस पूरे कार्यक्रम के संचालन की जिम्मेदारी खुद कुलजीत चहल ने ही संभाली। लेकिन उन्होंने इस समिति के अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नता धर्मवीर सिंह सहित 11 सदस्यों को मंच पर चढ़ने ही नहीं दिया। उन्होंने अपने संचालन के दौरान एक बार भी समिति अध्यक्ष धर्मवीर सिंह या उनकी टीम के 11 सदस्यों में से एक भी सदस्य का नाम नहीं लिया।


डेढ़ साल पहले मिली थी जिम्मेदारी
वरिष्ठ भाजपा नेता धर्मवीर सिंह को करीब डेढ़ साल पहले 15 जुलाई 2017 को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने बूथ प्रबंधन की जिम्मेदारी दी थी। तभी से धर्मवीर सिंह पूरी दिल्ली के करीब 14 हजार बूथों के अध्यक्षों, उनके सहयोगियों और पार्टी के कुछ और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को जोड़ने में लगे थे। इस दौरान सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में बूथ अध्यक्षों, उनके सहयोगियों और पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की बैठकें ली गई। सभी पदाधिकारियों की पूरी सूची तैयार की गई और उनके साथ सीधे संपर्क किया गया। इसके बाद भाजपा के गठन के बाद इस तरह की बूथ अध्यक्षों के पहले सम्मेलन का आयोजन किया गया था।


बूथ सम्मेलन की तैयारियों में नहीं रही कुलजीत की कोई भूमिका
23 दिसंबर को आयोजित हुए बूथ सम्मेलन से पहले प्रदेश महामंत्री कुलजीत चहल की इस मामले में कोई भूमिका नहीं रही। विधानसभा, जिला और लोकसभा स्तर पर हुई बूथ अध्यक्षों की बैठकों में भी कुलजीत चहल की कभी कोई भूमिका नहीं रही और ना ही कभी उनका कोई सहयोग रहा। खास बात है कि सम्मेलन से पहले सभी नेताओं को मंडल स्तर पर बूथ अध्यक्षां की तैयारियों से संबंधित बैठकें करने की जिम्मेदारी दी गई थी। सूत्रों का कहना है कि कुलजीत चहल ने ना ही इस तरह की केई बैठक ली और ना ही बूथ समिति अध्यक्ष को कभी कोई रिपोर्ट दी।
अपनी छवि बनाने को वरिष्ठ नेताओं की छवि की बलि
23 दिसंबर को इंदिरा गांधी स्टेडियम में वह हुआ जो शायद भाजपा के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ होगा। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के सामने कुलजीत चहल ने अपनी छवि बनाने के लिए एक बार भी इस कार्यक्रम की सफलता के लिए जिम्मेदार धर्मवीर िंसंह और उनकी टीम के बाकी 10 सदस्यों में से एक भी नेता का नाम नहीं लिया। जबकि सातों लोकसभा के बूथ प्रभारियों के साथ बाकी संगठन महामंत्री सिद्धार्थन, उनके कार्यालय सहयोगी राजकुमार और पूर्वी दिल्ली के पूर्व महापौर हर्ष मलहोत्रा और खुद इस समिति के अध्यक्ष धर्मवीर सिंह ने पूरे डेढ़ साल तक मेहनत की है। हालांकि संघ की ओर से नामित संगठन मंत्री तथाकथित संगठन महामंत्री सिद्धार्थन को मंच पर रखना संचालक और संयोजक की मजबूरी थी इसलिए उन्हें मंच पर रखा गया। लेकिन इस सफलता के लिए वास्तविक जिम्मेदार पार्टी नेताओं की छवि की बलि चढ़ा दी गई।


पंच परमेश्वर कार्यक्रम में भी नहीं टूटी परंपरा
यह परंपरा तो पिछले कुछ महीने पूर्व रामलीला मैदान में हुई पंच परमेश्वर कार्यक्रम में भी नहीं टूटी थी। पंच परमेश्वर समिति के अध्यक्ष तिलकराज कटारिया हैं जो उत्तरी दिल्ली नगर निगम में स्थायी समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं और फिलहाल नेता सदन हैं। उन्हें पूरे मान-सम्मान के साथ मंच पर स्थान दिया गया था। खास बात है कि भाजपा में काम करने वाले नेताओं को ज्यादातर महत्व दिया जाता रहा है। लेकिन पिछले दिनों हुए बूथ सम्मेलन में सारी परंपराओं को तोड़ दिया गया।


मनोज तिवारी ने बचाई इज्जत
23 दिसंबर को इंदिरा गांधी स्टेडियम में हुए बूथ सम्मेलन में कार्यक्रम के संयोजक बनाए गए प्रदेश महामंत्री कुलजीत चहल ने तो इस कार्यक्रम को अपने नाम करने की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी को इस कार्यक्रम और इसकी पिछले लंबे समय से चल रही तैयारियों की पूरी जानकारी थी। अतः उन्होंने अपने भाषण में बूथ समिति अध्यक्ष धर्मवीर सिंह और उनके सहयोगियों का नाम लेकर कुछ हद तक स्थिति को स्पष्ट करने की कोशिश की।


पहले भी ऐसा करते रहे कुलजीत चहल
दिल्ली प्रदेश महामंत्री कुलजीत चहल पहले भी ऐसा करते रहे हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि उन्हें एक बार पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखाया जा चुका है। दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता के कार्यकाल के दौरान उन्होंने वर्तमान केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली के खिलाफ प्रदर्शन कराया था। इसकी सजा उन्हें पार्टी से निष्कासन के तौर पर मिली थी। लेकिन वह अपने जुगाड़ और चाटुकारिता के चलते फिर से पार्टी में अच्छी स्थिति बनाने में कामयाब रहे। लेकिन अब उन्होंने एक बार फिर इस तरह की गतिविधियां शुरू कर दी हैं।


प्रदेश संगठन महामंत्री को घेरा
पार्टी सूत्रों का कहना है कि दिल्ली प्रदेश संगठन मंत्री/महामंत्री सिद्धार्थन भी कुलजीत चहल की अव्यवहारिक गतिविधियों का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। चहल ने पार्टी नेताओं के सामने सिद्धार्थन की कुछ ऐसी कमजोरियों को उजागर करने की बात कही है, जिससे पार्टी के अंदर घमासान मचा हुआ है। बताया जा रहा है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और प्रदेश संगठन मंत्री के बीच दूरियों के लिए भी यही गु्रप जिम्मेदार है।

Wednesday, November 29, 2017

एक ही लक्ष्य,एक ही नारा,दिल्ली का सी एम हो हमारा...


दिल्ली प्रदेश पूर्वांचल मोर्चा ने सभी नवनिर्वाचित निगम पार्षदों और उम्मीदवारों के सम्मान में प्रदेश कार्यालय में एक समारोह का आयोजन किया। इसकी अध्यक्षता भाजपा पूर्वांचल मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष श्री मनीष सिंह जी ने कीया..


सम्मान समारोह में पूर्वांचल मोर्चा के प्रदेश, जिला और मण्डल स्तर के सभी पदाधिकारी मौजुद रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य यह था की पूर्वांचल के उन नेताओं को सम्मान प्रदान करना था जिन्होंने अपने लगन और मेहनत से पार्टी और दिल्ली की जनता के बीच एक मुकाम बनाया है। इस सम्मान समारोह के माध्यम से ये भी सन्देश दिया गया कि किस तरह भाजपा को दिल्ली में अधिक से अधिक मजबूती प्रदान किया जाए और बिखरे हुए पूर्वांचलियों को एक साथ जोड़ कर उन्हें विकास के मुख्य धारा से जोड़ा जाए। क्योंकि अब यही कहेंगे कि एक ही लक्ष्य,एक ही नारा,दिल्ली का सी एम हो हमारा...



Saturday, November 18, 2017

प्रदूषण पर केजरीवाल सरकार विफल

पूर्वांचल मोर्चा के अध्यक्ष श्री मनीष सिंह जी तथा उनके पूर्वांचल मोर्चा के टीम 
दिल्ली के लोग ना केवल प्रदूषण से परेशान है अपितु गंदगी से भी उतने ही परेशान है अतः मोदी जी के स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ाते हुए आज मेरे साथ पूर्वांचल मोर्चा के अध्यक्ष श्री मनीष सिंह जी तथा उनके पूर्वांचल मोर्चा के टीम भी वहा मैजूद था और आज मै दावे के साथ कह सकता हूँ, केजरीवाल सरकार प्रदूषण तथा स्वच्छता दोनों ही मोर्चे पर पूरी तरह से विफल रही है..
पूर्वांचल मोर्चा के अध्यक्ष श्री मनीष सिंह जी ने कहा है कि पिछले तीन वित्तीय वर्षों के दौरान केजरीवाल सरकार ने पर्यावरण उपकर के रूप में 775 करोड़ रूपये वसूले हैं किन्तु पर्यावरण सुधार पर नगण्य राशि खर्च की है और वह भी पिछले साल..

इस वर्ष अर्थात 2017 में जब लोग प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित हुये हैं और केजरीवाल सरकार के पास 775 करोड़ रूपये उपलब्ध थे फिर भी केजरीवाल सरकार ने पर्यावरण को स्वच्छ करने पर खर्च करना उचित नहीं समझा। केजरीवाल सरकार द्वारा पर्यावरण के नाम पर खर्च किया गया अधिकांश धन मुख्यमंत्री के चित्र वाले होर्डिंग लगाने पर खर्च हुआ।

दिल्ली भाजपा अध्यक्ष श्री मनोज तिवारी जी ने कहा कि अब समय आ गया है कि केजरीवाल सरकार अधिकारिक रूप से दिल्ली को यह बतायें कि उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और उसे स्वच्छ करने के लिए क्या कार्य किये हैं। साथ ही लोगों से इकट्ठा किया गया पर्यावरण उपकर और लोगों पर खर्च की गई राशि का ब्यौरा भी दें..  और लोगो के स्वास्थ के साथ जो खिलवाड़ हुआ है उसका खामियाजा केजरीवाल सरकार को भूगतना ही पड़ेगा..
जय हिन्द 

Sunday, October 29, 2017

लोकमहापर्व छठ का समापन

लोकमहापर्व छठ का समापन हो गया। दिल्ली में हजारों जगह पर श्रद्धालुओं ने इस महापर्व में हिस्सा लिया। सबसे अधिक लोगों ने यमुना किनारे छठ पर्व का आयोजन किया। पर्व के दौरान यमुना नदी के किनारे गंदगी रह गई। इसे दूर करने का जिम्मा दिल्ली प्रदेश भाजपा के पूर्वांचल मोर्चा ने अपने कंधों पर लिया है।

पूर्वांचल मोर्चा के अध्यक्ष मनीष सिंह ने अपने साथियों के साथ यमुना घाट पर स्वच्छता अभियान चलाया। मैंने अपने साथियों और कई कार्यकर्ताओं के साथ घाटों पर फैले पूजा के विसर्जन वाले वस्तुओं को यमुना से बाहर निकाला। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, हमारे प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी जी और पूर्वांचल मोर्चा के अध्यक्ष मनीष सिंह जी जिस काम में दिन-रात लगे हुए हैं, हम भी अपने साथियों के साथ उसी कार्य को आगे बढा रहे हैं। हमने इस बार छठ घाटों पर स्वच्छता अभियान चलाया है। मुझे उम्मीद है कि अगली बार श्रद्धालु स्वयं ही इन घाटों से जाने से पूर्व साफ-सफाई करेंगे। हमें साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। मुझे खुशी होता है कि हमारे  पूर्वांचल मोर्चा के अध्यक्ष मनीष सिंह भी हमलोगों के साथ आकर श्रमदान करते रहे हैं।

अरबिंद झा
भाजपा पूर्वांचल मोर्चा, दिल्ली प्रदेश

Friday, December 30, 2016

मोदी का इस्तीफा

समसामयिक घटनाएँ यदि आपको उद्वेलित न करें तो समझिये आप जीवित मृत हैं. 

पढाई की समय सीमा समाप्त होने को हो और परीक्षा की घडी सर पर हो तो एक कर्मठ और अपने भविष्य को लेकर चिंतित छात्र जाने क्या क्या करने लगता है... उसकी कोशिश होती है की सफल होने के सारे संभव तरीके अपना ले.. कोई कसर छुट न जाए उससे जो उसे सफल बनाने की दिशा में हो.


कमोबेश आज प्रधानीमंत्री मोदी जी का यही हाल है. वो दिए गए समय सीमा के समाप्त होने से पहले हर संभव प्रयास कर लेना चाहते हैं. यदि कोई सफल होने को लेकर प्रयासरत हो, अपने फैसलों के परिणाम को लेकर चिंतित हो तो नि:संदेह वो गद्दार, बेईमान, चोर, धोखेबाज, स्वार्थी या अकर्मण्य तो नहीं हीं हो सकता है न.

हम अपने निजी जीवन में आगे बढ़ने को, प्रगति करने को कई सारे क़दम उठाते हैं... फैसले लेते हैं. किन्तु जरुरी नहीं हर फैसला या निर्णय शत-प्रतिशत सटीक परिणाम देता हो. कई बार हम असफल होते हैं या कम सफल भी होते हैं. हम फिर से प्रयास करते हैं... गिरते हैं... उठते हैं... किन्तु प्रगति पथ पर आगे तो बढ़ते ही हैं. कम से कम हम उन लोगों से तो ज्यादा ही सफल होते हैं जो कुछ नहीं करते.. सिवाय अपने ओहदे में निहित आनंद की प्राप्ति के.

आज कई सवाल किये जा रहे हैं प्रधानमंत्री से. कोई कह रहा है वो असफल हुए. किसी भाई को उनका इस्तीफा चाहिए तो कोई कह रहा है वो सिर्फ दिखावे की राजनीती कर रहे हैं... उनका दल देश में अव्यवस्था और अराजकता कायम कर रहा है.

एक जिम्मेवार नागरिक को आवश्यकता है इन सारे सवालों का जवाब पूर्वाग्रह छोड़कर ढूंढने की. सोचने की - कि क्या आगे बढ़ने को, प्रगति करने को प्रयास करना गलत है ?

क्या एक प्रधानमंत्री को बस प्रधानमंत्री पद का स्वाद लेते रहना चाहिए... क्या उसे वही सब करना चाहिए जो देश की आजादी के बाद ६०- ६५ वर्षों में किया गया ? स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी देश की 30% जनता को मुलभुत सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाया मगर २ या ३ साल में हमें सभी बिमारियों का ईलाज चाहिए...

दरअसल इसका भी एक सकारात्मक पक्ष है की हमें इस प्रधानसेवक से उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं जो और भी चरम पर तब पहुँच जाती थी जब मोदी बड़ी बड़ी बातें करते थे.


अब भले प्रधानमंत्री इन उम्मीदों पर वो खड़े ना उतरें हों... (नहीं हीं उतरे हैं), मगर वो प्रयास तो कर रहे.. वो हिम्मत तो दिखा रहे.. दुनियां की नजर तो ईधर कर पाए.. दशकों बाद विकासशील से विकसित देश बनने की उम्मीद तो जगा पाए. क्या ये सब उपलब्धि नहीं ?


कितने लोग पहले सफाई और स्वक्षता के लिए इतने जागरूक थे देश में ? कितनी समझ थी लोगों को देश द्रोह की... कितना बहिष्कार हुआ था चीनी समानों का पहले ? इससे पहले कितने प्रधानमंत्रियों को हम इतना घेरते थे... कितने प्रधानमंत्रियों के पीछे कांग्रेस की अकूत संपत्ति के साथ साथ कुछ घटियातम अवसरवादी नेता हाथ धो कर पड़े थे ?दिखावे की राजनीती की शुरुआत इस देश में क्यों और कब शुरू हुयी ? क्या बड़ी बड़ी बातें कारने वाले नेताओं को हम पसंद नहीं करते हैं ? इंदिरा के २० सूत्री कार्यक्रम से बड़ा गप्प क्या कोई हुआ देश में ? ३० -३५ वर्षों से देश में गरीबी मिटाई जा रही है कांग्रेस की सरकारों द्वारा... मिट गई ? क्या कर लिया किसी ने तब ? कितने कन्हैया... कितने केजरीवाल, रविश और कितने दिलीप मंडल यूँ बुझा तीर लिए फिरे थे तब. कितने ऐसे राजनेता थे तब जो खुद का काम छोड़कर मोदी विरोध का एकसूत्री कार्यक्रम चलाये बैठे थे ?

रही बात अव्यवस्था की... अराजकता और असहिष्णुता की. तो क्या मोदी या भाजपा ने कश्मीर और पंजाब में आग लगाई... क्या मोदी ने आसाम और बंगाल में अलगाववादी पाले थे.. मोदी ने सिखों की हत्याएं करवाई थी या फिर आँखफोड़वा कांड करवाया था ? क्या तब अव्यवस्था और अराजकता नहीं फैली थी देश में ? संभवतः हमें तब इन सब शब्दों का मतलब नहीं पता था.. असहिष्णुता का अर्थ नहीं पता था हमें तब.

आज यदि गौ-हत्या पर चर्चा हो रही है, यदि कोई मुस्लिम सिविल कोड की चर्चा कर रहा है, स्त्री को परदे में रहकर बच्चे पैदा करने की मशीन बनाये रखने का विरोध कर रहा है, JNU में पाकिस्तान जिंदाबाद का विरोध किया जा रहा, देश के बाहर भारत की बात हो रही है... लोग भविष्य को लेकर आशावादी हो रहे हैं और हम बेहतर भविष्य की बात कर रहे हैं तो क्या गलत हो रहा है ?

ये सही है की इन सब मुहीम में कुछ लोग अतिवादी हो रहे हैं... वो मोदी के रस्ते चलने की कोशिश में सीमाएं तोड़ दे रहे. किन्तु क्या हर इस बात का जिम्मेवार मुखिया ही होता है ?

सो मित्रों.. ! कृपया न्यूनतम समझ बुझ दिखाएँ... मुलभुत समझ रखें... सिर्फ विरोध का जहर फ़ैलाने के बजाय यह भी सोचें की आपके पास देने को कितना उचित समय है... सोचें की आपके पास विकल्प क्या है ?

एक अर्धविकसित दिमाग के राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं आप ? या फिर सुबह के कहे शाम को मुकर जाने वाले, स्वार्थ के लिए तुष्टिकरण का अवरेस्ट खड़ा करने वाले केजरीवाल जी होंगे आपके नए प्रधानमंत्री ? या फिर चंद वोट के लिए बांग्लादेशियों द्वारा देश की जनता को मरवाने वाली ममता चाहिए हमें ? क्या आप ऐसे लोगों को प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं ?

प्रवीण कुमार झा (बकैती)

Friday, November 13, 2015

उदारवाद का प्रतीक और एक भविष्यद्रष्टा प्रधानमंत्री

खलील जिब्रान ने लिखा है कि किसी व्यक्ति के दिलो-दिमाग को अगर समझना है तो इस बात को नहीं देखिए कि उसने अब तक क्या हासिल किया है, बल्कि इस बात पर गौर कीजिए कि वह क्या करने की अभिलाषा रखता है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के व्यक्तित्व पर विचार करने के लिए जिब्रान की यह उक्ति एक कसौटी हो सकती है। समस्या यह है कि नेहरु के व्यक्तित्व पर विचार करते समय देश की वर्तमान परिस्थिति और कांग्रेस पार्टी का मौजूदा नेतृत्व कुछ ज्यादा ही हावी हो जाते हैं, जबकि नेहरु का मूल्यांकन सम्पूर्णता में होना चाहिए। नेहरु का मूल्यांकन अतीत और वर्तमान दोनों के आइने में होना चाहिए-तभी हम उनके व्यक्तित्व की एक मुकम्मल तस्वीर हासिल कर पाएंगे।

आजाद भारत में नेहरू का प्रधानमंत्री बनना महज संयोग नहीं था, बल्कि नेहरु का व्यक्तित्व उन बहुत सारी बातों को परिलक्षित करता था जो इस देश की वास्तविकता थी और जिसे इस देश को अपने भविष्य में हासिल करना था और जिसका वादा आजादी की लड़ाई के दौरान किया गया था। इसमें कोई दो मत नहीं कि नेहरु, गांधी के सबसे प्रिय उत्तराधिकारी थे-एक प्राच्यवादी और देसी मानसिकता के गांधी के उत्तराधिकारी जिसे तत्कालीन और बाद के भी कई उदार वाम इतिहासकारों ने ‘हिंदू राइट’ की संज्ञा दी थी। लेकिन इसके उलट नेहरु एक हद तक पश्चिमी, आधुनिक, वैज्ञानिक मूल्यों को मानने वाले और समाजवाद की ओर झुके हुए व्यक्तित्व के थे। फिर भी गांधी के वे प्रिय शिष्य थे और कम से कम गांधी इस बात से मुतमईन थे कि इस देश की बहुलता, अखंडता, उदारवादी मूल्य और परंपरा के साथ वैज्ञानकि चेतना का सम्मिश्रण अगर हो सकता है तो वो नेहरु के व्यक्तित्व में ही संभव है। यह उस पीढी के नेतृत्व की उदारता थी जिसे गांधी की हत्या के बाद उनके सबसे प्रमुख शिष्यों में से एक पटेल ने भी स्वीकार किया था, जबकि बकौल डोमिनिक लेपियर उस समय कांग्रेस संगठन पर पटेल का ‘लौह नियंत्रण’ था।

नेहरु का मूल्यांकन करते समय उस कालखंड की समस्याओं पर एक नजर डालनी जरूरी है और आज की समस्याओं से उनकी तुलना भी। आजादी के बाद की मुख्य समस्याएं थीं-देश के बंटवारे के बाद की साम्प्रदायिक स्थिति, पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थियों का पुनर्वास, सैकड़ों रजवाड़ों में बंटे देश का एकीकरण, भयंकर समाजिक-आर्थिक विषमता, दो ध्रुबों में बंट चुकी दुनिया और उनकी चुनौतियां और सबसे बड़ी बात कि एक सार्थक लोकतंत्र की बहाली और उसे गतिशील बनाना। ये तो प्राथमिकताएं थीं लेकिन इसके अलावा एक वैज्ञानिक सोच से युक्त समाज निर्माण के लिए प्रेरक तत्व की भूमिका निभाना और ठोस नींव पर खड़े लोकतांत्रिक संस्थानों को गरिमा देना भी सरकार के एजेंडे में होना था। नेहरु के व्यक्तित्व का आकलन इन्हीं बिंदुओं पर किया जाना चाहिए कि वे उसमें कितना सफल हुए या उस दिशा में वे कितना अग्रसर हुए।
उस कालखंड की कई समस्याएं वर्तमान में भी ज्यों की त्यों बनी हुई है और कई तो उससे भी विकराल हो चुकी हैं जिसका सामना नेहरु ने किया था। ऐसे में नेहरु का अध्ययन अभी के लिए और आने वाले समय के लिए भी ज्यादा से ज्यादा प्रसांगिक होता जाएगा।

नेहरु से किसी विदेशी पत्रकार ने उनके जीवन और कार्यकाल के अंत में एक साक्षात्कार में पूछा था कि आप अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं? नेहरु का जवाब था, ‘एक अत्यधिक धार्मिक मानसिकता वाले देश में एक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के निर्माण की दिशा में कोशिश करना।’ नेहरु के उन पत्रों में जो वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक नियमित अंतराल पर लिखते रहते थे, देश के अल्पसंख्यकों के प्रति चिंता साफ झलकती है। देश के बंटवारे के समय हुई भयानक हिंसा ने नेहरु और उस पीढी के कई नेताओं को गहराई से प्रभावित किया था और गांधी की हत्या के बाद साम्प्रदायिकता देश के केंद्र में दस्तक दे रही थी। ऐसे में स्वभाविक ही था कि सरकार का मुखिया साम्प्रदायिकता को अपना दुश्मन नंबर एक कहता था और सन् बावन में हुए पहले आम चुनाव में नेहरु ने इसे एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी बनाया था।

उस जमाने में सरकार और कांग्रेस संगठन में शीर्ष स्तर पर कई बार नेहरु और पटेल के बीच मतभेद के बिंदु उभर कर सामने आए थे लकिन नेहरु ने साम्प्रदायिकता पर अपना स्पष्ट रुख बनाए रखा। चाहे तो पुरुषोत्तम दास टंडन का कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हो या राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपति बनना, नेहरु ने हर बार अपना स्पष्ट मत जाहिर किया। नेहरु ने उस समय भी अपना स्पष्ट विरोध जाहिर किया जब राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर पुनर्निमाण के उद्घाटन में जाने का फैसला किया। हिंदू कोड बिल को पारित करवाने में नेहरु ने अम्बेदकर के साथ कंधा में कंधा मिलाकर काम किया, हालांकि डॉ अम्बेदकर उसे तीब्र गति से पारित करवाना चाहते थे। लेकिन नेहरु जानते थे कि उनकी सीमाएं क्या हैं और वे एक हद तक बंटवारे के बाद की तत्कालीन हिंदू भावनाओं से सीधा टकराव भी नहीं चाहते थे। डॉ अम्बेदकर, सामान नागरिक संहिता के हिमायती थे लेकिन नेहरु ने इसे भविष्य में उचित समय आने तक के लिए छोड़ देने का आग्रह किया क्योंकि बकौल नेहरु, देश के अल्पसंख्यक इस समय बंटवारे के बाद की स्थिति में भय के साये में जी रहे थे और उन्हें एक मरहम की जरूरत थी। तो नेहरु की धर्मनिरपेक्षता इस तरह की थी, जो नारों या सतही जुमलों से कम उनके कार्यों से ज्यादा झलकती थी।

सन् अस्सी के दशक में कई बार पाकिस्तान का दौरा कर चुके प्रसिद्ध स्तंभकार चाणक्य सेन ने पाकिस्तान डायरी नामकी किताब में पाकिस्तान के एक मशहूर पत्रकार को उद्धृत किया जिसमें उसने कहा था कि पाकिस्तान की बदनसीबी ये रही कि कायदे आजम जिन्ना की जल्द ही मृत्यु हो गई और वहां के पहले प्रधानमंत्री को सालभर के अंदर गोली मार दी गई। जबकि हिंदुस्तान को नेहरु के नेतृत्व में एक लंबा और स्थायी शासनकाल मिला। नेहरु जिस हिसाब से देश में पहले आम चुनाव के लिए व्याकुल दिख रहे थे और जिस काबिलियत से उनकी सरकार ने पहले निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन को इसकी जिम्मेवारी सौंपी थी, वो नेहरु की लोकतंत्र में आस्था दर्शाता था। हालांकि उसकी एक वजह ये भी थी कि नेहरु नई संसद द्वारा कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवाना चाहते थे जिसमें हिंदू कोड बिल और जमींदारी उन्मूलन से संबंधित विधेयक भी थे। लेकिन अन्य वजह ये भी थी कि नेहरु इस देश को जल्द से जल्द लोकतंत्रिक प्रक्रिया से पहला साक्षात्कार करवाना चाहते थे जिसकी कई विदेशी विद्वानों ने एक खतरनाक जुआ कहकर आलोचना भी की थी। यहां गौर करने वाली बात ये है कि भारत के साथ आजाद हुए कई देशों(इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो हमारे साथ आजाद हुआ पाकिस्तान ही है)में लोकतंत्र की जगह अधिनायकवाद पनप आया, जबकि नेहरु के नेतृत्व में भारत में तीन निर्विघ्न लोकसभा चुनाव हुए और दर्जनों विधानसभाओं के चुनाव भी। उस जमाने में भी विदेशी आलोचकों ने भी किसी भी स्तर पर उन चुनावों को भेदभावजनक करार नहीं दिया। आजाद भारत, लोकतंत्र की पथरीली राह पर धीरे-धीरे अपना मजबूत कदम बढा रहा था और उस भारत के सबसे बड़े नायक जवाहरलाल नेहरु ही थे।

नेहरु ने कल कारखानों को आजाद भारत का तीर्थ कहा था। देश में विशाल इस्पात के कारखाने, पनबिजली परियोजनाएं, परमाणु बिजली के संयंत्र नेहरु सरकार की देन है। सरकार ने योजना-वद्ध विकास का एजेंडा तैयार किया था जो थोड़ा-थोड़ा सोवियत मॉडेल से प्रभावित था। हालांकि ऐसा नहीं है कि इसमे सिर्फ समाजवादी प्रभाव था, हकीकत तो ये है कि उस जमाने के उद्योगपति भी चाहते थे योजनावद्ध विकास का मॉडेल अपनाया जाए। देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों ने आजादी के पूर्व ही ‘बंबई प्लान’ के नाम से एक रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें सरकार से आग्रह किया गया था कि वो बुनियादी ढांचों में निवेश करे क्योंकि निजी क्षेत्र उस क्षेत्र में जाने के लिए तैयार नहीं था। दूसरी बात ये थी कि देश में भीषण आर्थिक असमानता थी और ऐसे में एक शिशु अर्थव्यवस्था को बिल्कलु निजी हाथों में छोड़ देने के अपने खतरे थे। भारत एक पूंजीवादी-साम्राज्यवादी देश की गुलामी से हाल ही में मुक्त हुआ था और देश का आम जनमानस भी पूंजीवाद को संशय की दृष्टि से देखता था। दुनिया के अधिकांश देशों में ये मानसिकता थी जो साम्राज्यवाद के चंगुल से उस समय मुक्त हो रहे थे। विदेश नीति के क्षेत्र में जवाहर लाल नेहरु ने जिस गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया, वो भी उसी भाव से प्रेरित था। ऐसे में नेहरु सरकार ने जिस योजनावद्ध विकास का मॉडेल अपनाया, उसकी कामयाबी पर बहस हो सकती है, लेकिन उसके उद्येश्यों पर नेहरु के विरोधी भी सवाल नहीं उठाते।

नेहरु के कार्यकाल में ही भाषा के आधार पर देश में पहली बार राज्यों का निर्माण हुआ था। हालांकि शुरू में खुद प्रधानमंत्री उसके समर्थक नहीं थे। हाल ही में धर्म के नाम पर देश का बंटवारा हो चुका था, सरकार इस बात से आशंकित थी कि भाषा के मुद्दे पर नया उथल-पुथल शुरू न हो। लेकिन आंध्रप्रदेश के आन्दोलनकारी पोट्टी श्रीराममलु ने जब राज्य के मुद्दे पर अनशन करते हुए जान दे दी तो नेहरु सरकार ने अपनी नीति पर पुनर्विचार किया। ऐसा ही पुनर्विचार सरकार ने हिंदी को लागू किए जाने पर किया और नेहरु के उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री ने भी सन् 1965 में वैसा ही किया। इस बात के लिए धुर हिंदीवादियों ने नेहरु के नेतृत्व की आलोचना की कि देश में अंग्रेजी के लिए एक चोर-द्वार खोल दिया गया लकिन इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि देश की अखंडता के मुद्दे पर तत्कालीन नेतृत्व ने भाषा के मुद्दे पर नरम रुख अख्तियार कर लिया। जबकि उसी समय हमारे पड़ोसी श्रीलंका और पाकिस्तान में भी कुछ ऐसी ही जिद वहां के बहुसंख्यकों ने कर ली थी, नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान के कुछ ही सालों में दो टुकड़े हो गए और श्रीलंका करीब आधी सदी तक उथल-पुथल से ग्रस्त और रक्तरंजित होता रहा। इन बातों के आलोक में नेहरु के नेतृत्व को देखा जाए तो हमें उसकी परिपक्वता का पता चलता है।

प्रसिद्द इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब इंडिया आफ्टर गांधी में लिखा है कि सन् नब्बे और उसके बाद के दशकों में भारत सॉफ्टवेयर सहित कई क्षेत्रों में जो दुनिया भर में झंडे गाड़े थे उसका श्रेय बहुत हद तक नेहरु की भाषा नीति और विज्ञान और तकनीक के प्रति उनके प्रेम को जाता है। ये बातें रेखांकित किए जाने योग्य हैं कि आईआईटी जैसे देश के मशहूर संस्थान पंडित नेहरु के ही स्वप्न थे। यहां यह बात गौर करने लायक है कि आजादी के करीब पचास साल बाद भारत को जिन-जिन क्षेत्रों में सफलता मिलती दिख रही है, उसमें नेहरु कालीन नीतियों की बड़ी भूमिका है। चाहे भारत का एक सॉफ्टवेयर महाशक्ति के तौर पर उभरना हो या अंतरिक्ष के क्षेत्र में छलांग लगाना या फिर एक लंबे समय तक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास कायम रखना, इन सारी बातों की नींव नेहरु के शासनकाल में ही डाली गई थी।

जहां तक विदेश नीति की बात थी तो नेहरु के नेतृत्व में भारत ने उचित ही तत्कालीन परिस्थितियों के हिसाब से गुटनिरपेक्षता की राह पकड़ी थी। क्योंकि साम्राज्यवाद के चुंगुल से मुक्त हो रहे एशिया और अफ्रीका के देशों को महाशक्तियों की होड़ में पड़ने की जरूरत नहीं थी। अमेरिका चाहता था कि दुनिया के तमाम देश उसकी सोवियत विरोधी मुहिम में शामिल हो और ऐसा वो पैसा और हथियार के बल पर करना चाहता था। ऐसे नवजात देशों में स्वभाविक रूप से पूंजीवादी-साम्राज्यवादी अमेरिकी खेमे के प्रति संशय का भाव था। दूसरी तरफ वे देश सीधे तौर पर सोवियत खेमा में भी नहीं जाना चाहते थे, क्योंकि हर देश की परिस्थितियां अलग-अलग थीं। ऐसे में विश्व पटल पर नेहरु का उदय गुट निरपेक्ष देशों के एक बड़े नायक के तौर पर हुआ जिसकी एक नैतिक सत्ता थी। आज के समय में ये बात आश्चर्यजनक लगती है कि एक गरीब, शक्तिहीन, नव-स्वतंत्र और समस्याओं से ग्रस्त देश का नेता कैसे इतनी नैतितक सत्ता हासिल कर सकता था कि दुनिया की बड़ी शक्तियां उसकी बात सुनने को मजबूर थी?

नेहरु ने पड़ोसियों के साथ शांति की नीति अख्तियार की थी। उनके मन में एक एशियाई का ब्लॉक बनाने का सपना भी तैर रहा था। ये नेहरु ही थे जिन्होंने चीन को मान्यता देने और सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता प्रदान करने के लिए जोर लगाया था, ये बाद अलग है कि सन् बासठ की लड़ाई के आईने में वो बात आज कइयों को अतार्किक लगती है। लेकिन नेहरु की दृष्टि सिर्फ दस-बीस सालों के तात्कालिक लाभ पर केंद्रित नहीं थी, वे दुनिया की दो प्राचीन सभ्यताओं को नजदीक लाने की कोशिश कर रहे थे जिसका असर विश्व की भू-राजनैतिक अर्थव्यवस्थाओं को बदलने वाला था। आजादी के करीब सात दशक बाद और एक-धुब्रीय हो चुकी विश्व-व्यवस्था की तपिश झेलने के बाद अगर वर्तमान भारतीय नेतृत्व फिर से वो कोशिश करता नजर आ रहा है तो हमें इस बात को स्वीकार करनी चाहिए कि नेहरु की दूरदृष्टि कहां तक थी। नेहरु की पाकिस्तान नीति भी शांति पर आधारित थी, वे चाहते थे कि कश्मीर समस्या का समाधान बातचीत से हो और अभी तक वहीं बातें कही जा रही है। नेहरु के बारे में जो लोग उनके पश्चिमी सोच के प्रति अत्यधिक झुकाव और अल्पसंख्यकों के प्रति अत्यधिक नरम रवैये के प्रति शंकालु हैं उन्हें नेहरू की किताब डिसकवरी ऑफ इंडिया पढनी चाहिए और गंगा नदी के बारे में व्यक्त उनके उदगार पढने चाहिए। साथ ही उन्हें ये देखना चाहिए कि यूरोप में फासदीवाद के उदय के प्रति नेहरू की प्रतिक्रिया थी। भारत की बहुलतावादी संस्कृति सिर्फ नेहरु का स्वप्न नहीं था, यह तो इस देश की संस्कृति का स्वभाव था और है, जिसे नेहरु कायम रखना चाहते थे।

नेहरु पर सबसे बड़ा आरोप चीन युद्ध में भारत की पराजय और वंशवाद को लेकर है। जहां तक वंशवाद की बात है तो ये याद रखने की आवश्यकता है कि नेहरु की मृत्यु के बाद उनके परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बना था और उनके वंशजों के कार्यों के लिए नेहरु को दोषी ठहराना उचित नहीं है। जहां तक चीन युद्ध की बात है तो नेहरु ने एक इतिहास के विद्यार्थी के तौर पर खुद स्वीकार किया था कि ‘दोनों देश अपने ज्ञात इतिहास में पहली बार अपनी सीमा को खोजने निकले थे। ऐसे में दोनों का अपनी सीमा को लेकर दावा-प्रतिदावा करना स्वभाविक था।’ जहां तक उस युद्ध में भारत की पराजय की बात है तो यह सिर्फ सैन्य पराजय से बढकर थी। जैसा कि सरदार पटेल ने नेहरु को अपनी मृत्यु से पहले ही आगाह किया था कि ‘चीन का साम्यवाद दरअसल साम्यवाद की आड़ में चीनी राष्ट्रवाद है’। उस दृष्टि से देखा जाय तो वह लड़ाई एक उदार, बहुलतावादी और वैश्विक मानसिकता के भारत का एक अति राष्ट्रवादी, आत्मकेंद्रित, यूरोप-विरोधी मानसिकता वाले चीन से भिडंत थी। उस हिसाब से चीन युद्ध नेहरु के सम्पूर्ण करियर में एक मात्र बड़ी गलती दिखती है, लेकिन राष्ट्रों के इतिहास में ऐसे क्षण आते रहते हैं और किसी नेतृत्व के आकलन की एकमात्र कसौटी वो नहीं होती।

नेहरु दिल से समाजवादी थे, वे सोवियत म़ॉडेल की नियोजित अर्थव्यवस्था के प्रशंसक थे, लेकिन गांधी का वह शिष्य अपने अंतर्मन में उतना ही बड़ा अहिंसक था। यूरोपीय उदारवाद का उन पर गहरा असर था, प्रेस की स्वतंत्रता के वे प्रबल समर्थक थे। एक दलीय अधिनायकवाद के वे उतने ही खिलाफ थे और सुयोग्य व्यक्तियों की उनको उतनी ही कद्र थी। वैज्ञानिक डॉ होमी भाभा, विक्रम साराभाई, चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन, द्वीतिय पंचवर्षीय योजना के मुख्य सूत्रधार पी सी महालनोबिस नेहरु के ही चुनाव थे। संसदीय परंपरा में विपक्ष की भूमिका के वे उतने ही समर्थक थे, इसका अंदाज उन बहसों और पत्राचारों से लगाया जा सकता है जो नेहरु ने तत्कालीन प्रतिपक्ष के नेताओं के साथ की थी।

हिंदुस्तान की मौजूदा पीढी जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उदारवाद, विदेशों में अपनी सफलता और भारत की नव-अर्जित वैश्विक स्थित का गौरवगान करती है तो वो प्रधानमंत्री नेहरु को अक्सर भूल जाती है। अक्सर उनके व्यक्तित्व को उनके वंशजों के व्यक्तित्व साथ गड्डमड्ड कर दिया जाता है। शायद आनेवाला दौर नेहरु को और भी बेहतर समझ पाएगा-जब भारत और दुनिया भर में बहुलतावादी संस्कृति और वैचारिक उदारता पर हमले लोगों को ज्यादा बैचेन कर रहे होंगे।

amrapaali.blogspot.com| By sushant jha

Wednesday, November 26, 2014

काले से गोरा बना देने का हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड का कारोबार यानि सबसे बड़ी ठगी


युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट पंकज कुमार झा





ज्योतिष के नाम पर ठगी का कारोबार काफी छोटा है. हम हमेशा अपनी आय का एक काफी-काफी छोटा अंश इस नाम पर खर्चते हैं. मसलन कोई दस हज़ार की नौकरी करने वाला होगा तो वो पंडित को 11 रुपया दक्षिणा देगा, कोई करोड़पति होगा तो एक-दो नीलम-पुखराज पहन लेगा. लेकिन इस ठगी के बरक्स ज़रा बड़े ठगों पर ध्यान दीजिये. आज हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड (दुनिया भर में उस देश का नाम और आगे लीवर लिमिटेड जोड़ दीजिये) का काले से गोरा बना देने का कारोबार किस हद तक ठगी का नायब नमूना है, उसे देखिये. ज़रा उसका टर्न ओवर देख लीजिये. कई देशों के जीडीपी से ज्यादा इनकी अकेले आमदनी है.

किसी जान्शन एंड जान्शन या प्रोक्टर एंड गेम्बल द्वारा ऐसे ही की जा रही ठगी और अवैज्ञानिक अंधविश्वास पर नज़र डालिए. विश्व सुन्दरी हमेशा उस देश से बनाए जाने के कारोबार को देखिये जहां बाज़ार की संभावना दिखे. एक विज्ञापन का अंधविश्वास देख लीजिये जिसमें घोषणा की जाती है कि मेरी कंपनी का डियो इस्तेमाल करोगे तो लड़कियां पास आयेंगी.. दूसरे का करोगे तो बस छींक आयेगी. जेनरिक दवाओं के बदले ब्रांडेड का कारोबार देख लीजिये. दो रुपये कीमत वाले रसायन का 2 हज़ार दाम वसूलते दवा कारोबारी को देखिये.

बीज और खाद के नाम पर फैले अन्धविश्वास और ठगी को देख लीजिये. एक रुपया किलो में आलू खरीद 200 रुपया किलो का चिप्स बेचने वाले ठगों को देखिये. सारदा जैसे सैकड़ों कंपनियों द्वारा फैलाये अंधविश्वास को देखिये कि सारा खून-पसीना किसी ममता बनर्जी के पास बंधक रख दीजिये, किरपा आयेगी. मज़हब के नाम पर 'मानव बम' बन जाने वाले अंधविश्वास को देखिये. एक-एक नाकाबिल और अन्धविश्वासी व्यक्ति द्वारा चार-चार लड़कियों की जिन्दगी बर्बाद कर देने वाले कानूनी ठगी को देखिये. 72 हूरों के मिलने का अंधविश्वास और उसे पाने के लिए बहाई जाती खून की नदियों को देखिये. किसी पॉल दिनाकरण को देखिये. इसाई संत बनाने के कारोबार को देखिये. नक्सलवाद के नाम पर हर साल ठगे जा रहे हज़ारों करोड़ को देखिये. फसल की उचित कीमत नहीं मिलने पर किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या और उसी फसल को दस गुना ज्यादा कीमत पर आपको बेचने की ठगी पर नज़र डालिए. मौसम विभाग द्वारा हमेशा गलत अनुमान प्रस्तुत कर देश से हजारों करोड़ झटक लेने की ठगी को देख लीजिये.

तय मानिये... इसकी तुलना में किसी गरीब ज्योतिषी का कारोबार आपको भूसे के ढेर में सूई की मानिंद ही लगेगा. लेकिन भूसे के बदले हमेशा 'सूई' को खोजते रहने की मिडिया की मजबूरी ये है कि जिस दिन 'भूसे' को दमदारी से प्रसारित करना शुरू किया, उसी दिन से उसका बाल-बच्चा पालना मुश्किल हो जाएगा. वो इसलिए क्यूंकि तमाम टीआरपी का अंधविश्वास और विज्ञापन की ठगी का जरिया वही ऊपर वाली चीज़ें हैं. सो... अपनी अकल लगाइए और सोशल मीडिया के ज़माने में अपना एजेंडा खुद सेट कीजिये. किसी सनी लियोनी या चैनल के सितारों को बस मनोरंजन के लिए इस्तेमाल कीजिये. जैसे कभी-कभार वयस्कों वाली फिल्म देखते हैं न, वैसे ही समाचार चैनल भी देखिये. पोर्न स्टार जितना ही 'सम्मान' इस कथित चौथे खम्भे को दीजिये. खुद को फेसबुक पर व्यक्त कीजिये. यहीं से अपना ओपिनियन बनाइये...बस.

और आखिर में तीन किस्से...

पत्रकारिता के एक कनिष्ठ मित्र अपने संपर्क में थे. लगातार फोन आदि करते रहते थे. एक दिन मित्र ने जानकारी दी कि अंतत उनकी नौकरी लग गयी एक बड़े अखबार में. बधाई देने के बाद पूछा कि अभी क्या कर रहे हो वहां? तो बोले कि अभी तो सीख ही रहा हूं. हां.. संपादक के नाम पत्र वाला कॉलम आजकल मैं ही देखता हूं. सारे पत्र मैं ही लिखता हूं. अब ऐसे ही बड़े अखबार दैनिक राशिफल भी खुद ही लिख लेते हैं तो इसमें ज्योतिष का क्या कसूर?

दूसरा किस्सा भारत के प्रधानमंत्री रहे स्व. चन्द्रशेखर के बारे में. यह किसी से सुना था या कहीं कभी पढ़ा था एक बार. ज़ाहिर है उनका कद ऐसा तो था ही कि वो चाहते तो हमेशा मंत्री बने रह सकते थे, वो भी बड़े से बड़ा पोर्टफोलियो लेकर. अपन सब जानते हैं कि उस 'भोंडसी के संत' की ज्योतिष आदि पर भी अगाध आस्था थी. उनके ज्योतिषी ने चन्द्रशेखर से कहा था कि उन्हें राजयोग है तो ज़रूर लेकिन क्षीण योग है. और वो भी बस एक बार ही किसी राजकीय पद तक पहुचा सकता है. कहते हैं कि तभी चन्द्रशेखर जी ने यह तय कर लिया था कि अगर एक बार ही बनना है तो प्रधानमंत्री ही बनेंगे, दूसरा कोई पद नही लेंगे. अब इस बात का कोई आधिकारिक प्रमाण तो हो नही सकता लेकिन अनुभवी लोग शायद इस बात पर कोई प्रकाश डाल पायें.

तीसरा किस्सा मेरे यहां के एक ज्योतिषी कामेश्वर झा जी का. आंखों-देखी झा जी के फलादेश की कहानियां इतनी है मेरे पास कि क्या कहूं? खैर..वो कहानी फिर कभी. अभी बस ये याद आया कि वो पतरा (पंचांग) भी बनाते थे. चन्द्र या सूर्य ग्रहण कब लगेगा, ये जानने उन्हें किसी इसरो या नासा के वैज्ञानिकों के पास नहीं जाना पड़ता था. कॉपी-कलम उठाते थे. कुछ गुणा-भाग किया और बता देते थे कि फलाने दिन चन्द्र ग्रहण तो ठिमकाने दिन सूर्य ग्रहण लगेगा. मजाल है राहू के बाप का कि एक दिन भी वो कामेश्वर जी द्वारा बताये समय पर नहीं हाज़िर हुआ हो, अपने 'शिकार' के पास. बिलकुल चाक-चौबंद और पाबंद रहता था राहु. अपना मूंह फाड़े बिलकुल तैयार. आप अगर चाहते तो अपनी घड़ी सही कर सकते थे राहु की उस सवारी के अनुसार.

भाजपा से जुड़े युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट पंकज कुमार झा के फेसबुक वॉल से.

जनता को क्या मिला नेताजी?

 भारत के महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, प्रखर चिन्तक और आदर्श समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने महात्मा गांधी को वाइसराय के नाम पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया, जिसमें महात्मा गांधी ने लिखा कि अहिंसानिष्ट सोशलिस्ट डॉ. लोहिया ने भारतीय शहरों को बिना पुलिस व फौज के शहर घोषित करने की कल्पना निकाली है। इसके अलावा महात्मा गाँधी ने डॉ. लोहिया की प्रेरणा से 'भारत छोड़ो' आंदोलन चलाया, जिसमें "करो या मरो" का संदेश दिया गया, इस आंदोलन को डॉ. लोहिया ने सफल बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी। आज़ादी के बाद वे अंग्रेजों को भगाने की तरह ही अंग्रेजी के विरुद्ध अभियान चलाते रहे, साथ ही लोकसभा में उनकी सर्वाधिक चर्चित बहस को "तीन आना बनाम पन्द्रह आना" के नाम से जाना जाता है, जिसमें उन्होंने 18 करोड़ आबादी के चार आने पर जिंदगी काटने तथा प्रधानमंत्री पर 25 हजार रुपए प्रतिदिन खर्च करने का आरोप लगाया था। 

अब बात करते हैं समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की, जो स्वयं को डॉ. लोहिया के आदर्शों का सब से बड़ा पहरेदार मानते हैं। उनके बेहद खास कहे जाने वाले आजम खां ने अपने गृह नगर रामपुर में उनके  जन्मदिन पर समारोह आयोजित किया, जिसमें सब कुछ अंग्रेजी और कीमती ही था। रामपुर के जिलाधिकारी आवास के सामने से अपने पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, भाई शिवपाल सिंह यादव और आजम खां के साथ सवार  होकर लगभग पांच-छः किमी दूर स्थित गांधी समाधि तक मुलायम सिंह यादव दो घोड़ों की बग्घी से गये, उसके बारे में बताया गया कि रानी विक्टोरिया की बग्घी ख़ास उनके लिए लंदन से रामपुर मंगाई गई। पंडाल, मंच और चारों ओर लगे बड़े-बड़े स्क्रीन भी अंग्रेजी तकनीकी वाले ही थे। जन्मदिन के अवसर पर काटी गई विशेष केक के साथ भोजन भी अंग्रेजी तरीकों से ही बनाया गया, इस सब के अलावा लगभग 14 किमी ऐसा क्षेत्र पूरी तरह विशेष सुरक्षा बलों की निगरानी में रहा, जहां आम आदमी बिना जाये रह ही नहीं सकता। अब यहाँ सवाल उठता है कि व्यक्तिगत तौर पर मुलायम सिंह यादव को इस भव्य आयोजन से क्या लाभ हुआ,  समाजवादी पार्टी का क्या हित हुआ?

वास्तव में इस विवादित और भव्य आयोजन से मुलायम सिंह यादव और समाजवादी पार्टी को लेकर आम आदमी के बीच प्रतिकूल संदेश ही गया है। समाजवादी सोच के साथ विवादित और भव्य शब्द जुड़ेंगे, तो स्वाभाविक ही है कि आम आदमी के मन में प्रतिकूल विचार ही आयेंगे और जब यह पहले से निश्चित है, तो विवादित और भव्य आयोजन करने की आवश्यकता क्या थी? यहाँ फिर यह सवाल उठता है कि विवादित और भव्य आयोजन हुआ क्यूं? सवाल यह भी है कि इस आयोजन से लाभ किसे हुआ? 

रामपुर शहर क्षेत्र से विधायक और उत्तर प्रदेश सरकार में मुख्यमंत्री के बाद सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्री कहे जाने वाले आजम खां की सोची-समझी नीति का हिस्सा प्रतीत होता है यह आयोजन। पुनः वापसी के बाद से वे  पार्टी में हावी हैं और सरकार बनी, तो सरकार पर भी वे लगातार हावी बने हुए हैं। उनके अधिकाँश विरोधी किनारा कर गये हैं। पिछले दिनों थोड़ी सी नाराजगी का असर यह हुआ कि पत्नी को भी पार्टी ने राज्यसभा भेज  दिया। सब कुछ उनके मन के अनुसार हो रहा है, लेकिन वे यह भी जानते ही होंगे कि राजनैतिक वैभव और सम्मान अस्थाई है, इसका कुछ पता नहीं कि कब चला जाये, इसलिए उनका संपूर्ण ध्यान अब अपनी चर्चित मौलाना जौहर अली यूनिवर्सिटी पर आ गया है। पिछले दिनों यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा मिलने से उनकी खुशी सातवें आसमान पर है ही, ऐसे में वे सरकार के रहते यूनिवर्सिटी को और भव्य रूप देना चाहते हैं। शोध, विषय, भवन और स्टाफ के साथ अन्य तमाम आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहते हैं, विस्तार देना चाहते हैं। हालाँकि इस सब से जनता का ही हित होना है, लेकिन अजर-अमर रहने वाला यश और कीर्ति आजम खां को ही
मिलनी है, इसी चाह में उन्होंने यूनिवर्सिटी कैंपस में जन्मदिन मनाने का निर्णय लिया, जिसे मुलायम सिंह यादव टाल ही नहीं सकते थे, क्योंकि भोले से मुलायम सिंह यादव इस प्रस्ताव को सिर्फ अपने प्रति प्रेम और आदर  ही समझे होंगे।

अब बात करते हैं भव्य आयोजन और उस पर हुए व्यय की, तो इसमें भी बुद्धि का विशेष प्रयोग किया गया है। मंच के पीछे लगे होर्डिंग में मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन का उल्लेख तक नहीं है, उसमें मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव के कर-कमलों द्वारा साइकिल वितरण समारोह बताया गया है, अर्थात बाहरी तौर पर मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन के रूप में समारोह को प्रचारित किया गया, जबकि कागजी तौर पर यह समारोह पूरी तरह सरकारी ही रहा, इसीलिए समस्त विभाग तन-मन और धन से सहयोग कर पाये, लेकिन सरकारी विभागों की ओर से भी मुलायम सिंह यादव को जन्मदिन की शुभकामनायें देने वाले बैनर, पोस्टर, होर्डिंग आदि नहीं लगाये गये। जन्मदिन संबंधी होर्डिंग सड़क किनारे छुटभैयों नेताओं ने ही लगाये, जिससे वातावरण जन्मदिन का ही दिखाई दिया, पर यह सब भी अधिकांशतः यूनिवर्सिटी कैंपस से बाहर तक ही सीमित रहा। कुल मिला कर भव्यता और धन की पूर्ति सरकारी समारोह होने से ही हो गई, लेकिन तमाम जरूरी कार्य ऐसे भी होते हैं, जिनके बिल-बाउचर सरकारी खातों में नहीं डाल सकते, ऐसे कार्यों के लिए धन की पूर्ति आजम खां द्वारा रामपुर जिले में
विशेष तौर पर लाये गये प्रमोटिड जिलाधिकारी सीपी त्रिपाठी ने ही की।

 सीपी त्रिपाठी इससे पहले बदायूं जिले के जिलाधिकारी थे, वहां उन्होंने समस्त विभागों के सहयोग से कई भव्य आयोजन कर सांसद धर्मेन्द्र यादव के लिए प्रसन्न किया था। बदायूं में आयोजित समारोह में आजम खां गये,  तो वे स्वयं सीपी त्रिपाठी के दिमाग का कमाल देख कर स्तब्ध रह गये और जिन्न की तरह इच्छाओं की पूर्ति करने वाले सीपी त्रिपाठी को रामपुर का जिलाधिकारी बना कर ले गये। विरोधी और मीडिया भले ही आजम खां  की आलोचना कर रहे हैं, लेकिन आयोजन के पीछे मुख्य दिमाग प्रमोटिड जिलाधिकारी सीपी त्रिपाठी का है।
प्रमोटिड जिलाधिकारी सीपी त्रिपाठी के प्रयासों से शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री आजम खां के नंबर मुलायम सिंह यादव की नजर में भले ही और अधिक बढ़ गये हों, लेकिन आम आदमी की नजर में जिलाधिकारी सीपी त्रिपाठी  पूरी तरह फेल नजर आये। आजम खां को खुश करने की अति में सीपी त्रिपाठी ने रामपुर शहर के ही नहीं, बल्कि जिले भर के स्कूलों के बच्चे और अध्यापक सुबह ही बुला लिए और जिलाधिकारी आवास से लेकर यूनिवर्सिटी  की ओर जाने वाले मार्ग के किनारे रामपुर के बाहर करीब 8 किमी दूर तक कतार में खड़े कर दिए, जिनके हाथों में फूल थे, मुलायम को शुभकामनायें देते हुए तख्तियां थीं और गुब्बारे आदि थे। बच्चे सुबह 11 बजे के  आसपास बुला लिए गये और शाम 7 बजे के आसपास छोड़े गये, जिनमें 4 साल के बच्चे से लेकर बीस साल तक की आयु वर्ग के थे। हाई स्कूल, इंटर के छात्र-छात्राओं के साथ उनके साथ आई  अध्यापिकाओं का बुरा हाल हो गया, ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि चार-पांच और छः साल वर्ष तक के बच्चों का क्या हाल हुआ होगा। परेशानी यहीं तक सीमित नहीं रही, जब छोटे बच्चे दोपहर एक-दो बजे तक घर नहीं लौटे,  तो उनके परेशान माता-पिता भी मौके पर आ गये, तो उन्हें भी अंत तक खड़ा रहना पड़ा, इसके अलावा रामपुर को जोड़ने वाले अधिकाँश मार्गों की यातायात व्यवस्था बाधित कर दी गई एवं शहर का मुख्य सिविल लाइन क्षेत्र  सुबह से ही बंद कर दिया गया, जिससे शहर के साथ जिले भर में हाहाकार मचा रहा।

दर्दनाक बात तो यह रही कि जिलाधिकारी आवास के सामने मुलायम सिंह यादव बग्घी में बैठे, वहीं उनकी बग्घी को सैकड़ों सपा  कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने चारों दिशाओं से घेर लिया और अंत तक घेरे ही रहे, जिससे सुबह से कतार बनाये खड़े हजारों बच्चों को मुलायम सिंह यादव देखने तक को नहीं मिले, साथ ही भीड़ के दबाव में जवान छात्रायें व अध्यापिकायें असहज भी नजर आईं। यातायात व्यवस्था को आंशिक तौर पर बाधित करना और चुनिंदा बच्चों के मंच पर कार्यक्रम करा देना सराहनीय कार्य होता, लेकिन जिलाधिकारी सीपी त्रिपाठी की अदूरदर्शिता के चलते आम जनता, अध्यापिकायें, बच्चे और उनके अभिवावक शीर्ष नेतृत्व को ही कोसते नजर आये। जिलाधिकारी सीपी त्रिपाठी के मौखिक तानाशाही पूर्ण आदेश का ही दुष्परिणाम कहा जायेगा कि मुलायम सिंह यादव को शुभकामनायें देने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा संचालित कॉलेज के छात्र-छात्रायें भी कतार में ही नहीं खड़े थे, बल्कि नाच-गा भी रहे थे। संघ के शीर्ष नेतृत्व के संज्ञान में यह सब नहीं पहुंचा है। अगर, संघ की ओर से यह जवाब माँगा गया कि उनके कॉलेज के छात्र-छात्राओं को जबरन क्यूं बुलाया गया, तो इसका जवाब जिलाधिकारी सीपी त्रिपाठी ही नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी देते नहीं बनेगा।

खैर, भव्य आयोजन था और राजनैतिक समारोह था, तो तमाम कमियां भी हो सकती हैं और विवाद भी स्वाभाविक ही हैं। बग्घी इंग्लैण्ड से आई या रामपुर में ही खड़ी थी, वो अंग्रेजी काल की है या आज़ाद भारत की?  समारोह शालीन और सहज था या अतिवादी? धन कितना खर्च हुआ और किस स्रोत से हुआ? ऐसे अन्य तमाम सवालों को किनारे रख देते हैं, फिर भी एक नया सवाल यह उठ रहा है कि समाजवादी मुलायम सिंह यादव का  कद सामंतवादी व्यवस्था पर सवार होने से बढ़ेगा या घटेगा?, वैसे मुलायम सिंह यादव ने आज तक स्वयं को सुप्रीमो कहने पर भी आपत्ति दर्ज नहीं कराई है, ऐसे में उनका बग्घी पर बैठना कोई बड़ी घटना नहीं मानी जानी  चाहिए, क्योंकि सुप्रीमो, मुखिया और प्रमुख शब्द समाजवादियों के लिए नहीं बनाये गये थे, ऐसे माहौल में कल्पना करने की बात तो यह है कि अगर, डॉ. लोहिया कहीं से यह सब देख रहे होंगे, तो उनकी  मनःस्थिति क्या होगी?


Wednesday, February 19, 2014

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी कि जीवन परिचय

 नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
जन्म :- 17 सितंबर, 1950

जन्म भूमि :- वड़नगर, मेहसाणा ज़िला, गुजरात

पद :- चौदहवें मुख्यमंत्री, गुजरात

कार्यकाल :- 7 अक्टूबर, 2001 से अब तक

विद्यालय :- गुजरात विश्वविद्यालय

शिक्षा :- एम.ए (राजनीति शास्त्र)

पुरस्कार उपाधि :- देश के सबसे श्रेष्ठ ई-गवर्न्ड राज्य का ELITEX 2007 - पुरस्कार भारत की केन्द्र सरकार की ओर से प्राप्त।

जीवन परिचय:-
नरेंद्र मोदी को अपने बाल्यकाल से कई तरह की विषमताओं एवं विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है, किन्तु अपने उदात्त चरित्रबल एवं साहस से उन्होंने तमाम अवरोधों को अवसर में बदल दिया, विशेषकर जब उन्होने उच्च शिक्षा हेतु कॉलेज तथा विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। उन दिनों वे कठोर संद्यर्ष एवं दारुण मन:ताप से घिरे थे, परन्तु् अपने जीवन- समर को उन्होंने सदैव एक योद्धा-सिपाही की तरह लड़ा है। आगे क़दम बढ़ाने के बाद वे कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखते, साथ-साथ पराजय उन्हें स्वीकार्य नहीं है। अपने व्यक्तित्व की इन्हीं विशेषताओं के चलते उन्होंने राजनीति शास्त्र विषय के साथ अपनी एम.ए की पढ़ाई पूरी की।

राजनीतिक जीवन:-
1984 में देश के प्रसिद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस) के स्वयं सेवक के रूप में उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत की। यहीं उन्हें निस्वार्थता, सामाजिक दायित्वबोध, समर्पण और देशभक्ति के विचारों को आत्म सात करने का अवसर मिला। अपने संघ कार्य के दौरान नरेंद्र मोदी ने कई मौकों पर महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। फिर चाहे वह 1974 में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चलाया गया आंदोलन हो, या 19 महीने (जून 1975 से जनवरी 1977) चला अत्यंत प्रताडि़त करने वाला 'आपात काल'हो।

भाजपा में प्रवेश:-
1987 में भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) में प्रवेश कर उन्होंने राजनीति की मुख्यधारा में क़दम रखा। सिर्फ़ एक साल के भीतर ही उनको गुजरात इकाई के प्रदेश महामंत्री (जनरल सेक्रेटरी) के रूप में पदोन्नत कर दिया गया। तब तक उन्होंने एक अत्यंत ही कार्यक्षम व्यवस्थापक के रूप में प्रतिष्ठा हासिल कर ली थी। पार्टी को संगठित कर उसमें नई शक्ति का संचार करने का चुनौतीपूर्ण काम भी उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस दौरान पार्टी को राजनीतिक गति प्राप्त होती गई और अप्रैल, 1990 में केन्द्र में साझा सरकार का गठन हुआ। हालांकि यह गठबंधन कुछ ही महीनो तक चला, लेकिन 1995 में भाजपा अपने ही बलबूते पर गुजरात में दो तिहाई बहुमत हासिल कर सत्ता में आई।

व्यक्तित्व नरेन्द्र मोदी:-
नरेन्द्र मोदी की छवि एक कठोर प्रशासक और कड़े अनुशासन के आग्रही की मानी जाती है, लेकिन साथ ही अपने भीतर वे मृदुता एवं सामर्थ्य की अपार क्षमता भी संजोये हुए हैं। नरेन्द्र मोदी को शिक्षा-व्यवस्थामें पूरा विश्वास है। एक ऐसी शिक्षा-व्यवस्थाजो मनुष्य के आंतरिक विकास और उन्नति का माध्यम बने एवं समाज को अँधेरे, मायूसी और ग़रीबी के विषचक्र से मुक्ति दिलाये। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नरेन्द्र मोदी की गहरी दिलचस्पी है। उन्होंने गुजरात को ई-गवर्न्ड राज्य बना दिया है और प्रौद्योगिकी के कई नवोन्मेषी प्रयोग सुनिश्चित किये हैं। 'स्वागत ऑनलाइन' और 'टेलि फरियाद' जैसे नवीनतम प्रयासों से ई-पारदर्शिता आई है, जिसमें आम नागरिक सीधा प्रशासन के उच्चतम कार्यालय का संपर्क कर सकता है। जनशक्ति में अखण्ड विश्वास रखने वाले नरेन्द्र मोदी ने बखूबी क़रीब पाँच लाख कर्मचारियों की मज़बूत टीम की रचना की है। नरेन्द्र मोदी यथार्थवादी होने के साथ ही आदर्शवादी भी हैं। उनमें आशावाद कूटकूट कर भरा है। उनकी हमेशा एक उदात्त धारणा रही है कि असफलता नहीं, बल्कि उदेश्य का अनुदात्त होना अपराध है। वे मानते हैं कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के लिए स्पष्ट दृष्टि, उद्देश्य या लक्ष्य का परिज्ञान और कठोर अध्यवसाय अत्यंत ही आवश्यक गुण हैं।

पुरस्कार:-
मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कार्यकाल के दौरान राज्य के पृथक-पृथक क्षेत्रों में 60 से अधिक पुरस्कार प्राप्त किये हैं। उनमें से कुछ का उल्लेख नीचे किया जा रहा है-

16-10-2003 आपदा प्रबंधन और ख़तरा टालने की दिशा में संयुक्त राष्ट्र की ओर से सासाकावा पुरस्कार।

अक्टूबर-2004 प्रबंधन में नवीनता लाने के लिए 'कॉमनवेल्थ एसोसिएशन्स' की ओर से CAPAM गोल्ड पुरस्कार।

27-11-2004 'इन्डिया इन्टरनेशनल ट्रेड फेयर-2004 में इन्डिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर गुजरात्स एक्सेलन्स' की ओर से 'स्पेशल कमेन्डेशन गोल्ड मेडल' दिया गया।

24-02-2005 भारत सरकार की ओर से गुजरात के राजकोट ज़िले में सेनिटेशन सुविधाओं के लिए 'निर्मल ग्राम' पुरस्कार दिया गया।

25-04-2005 भारत सरकार के सूचना और तकनीकी मंत्रालय और विज्ञान-तकनीकी मंत्रालय द्वारा 'भास्कराचार्य इन्स्टिट्यूट ऑफ स्पेस एप्लिकेशन' और 'जिओ-इन्फर्मेटिक्स' गुजरात सरकार को "PRAGATI" के लिए 'एलिटेक्स' पुरस्कार दिया गया।

21-05-2005 राजीव गांधी फाउन्डेशन नई दिल्ली की ओर से आयोजित सर्वेक्षण में देश के सभी राज्यों में गुजरात को श्रेष्ठ राज्य का पुरस्कार मिला।

01-06-2005 भूकंप के दौरान क्षतिग्रस्त हुए गुरुद्वारा के पुनःस्थापन के लिए यूनेस्को द्वारा 'एशिया पेसिफिक हेरिटेज' अवार्ड दिया गया।

05-08-2005 'इन्डिया टुडे' द्वारा श्रेष्ठ निवेश पर्यावरण पुरस्कार दिया गया।

05-08-2005 'इन्डिया टुडे' द्वारा सर्वाधिक आर्थिक स्वातंत्र्य पुरस्कार दिया गया।

27-11-2005 नई दिल्ली में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में गुजरात पेविलियन को प्रथम पुरस्कार मिला।

14-10-2005 गुजराती साप्ताहिक चित्रलेखा के पाठकों ने श्री नरेन्द्र मोदी को 'पर्सन ओफ द इयर' चुना। इस में टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा दूसरे क्रम पर और सुपरस्टार अमिताभ बच्चन तीसरे स्थान पर रहे। ये पुरस्कार दिनांक 18-05-2006 को दिये गये।

12-11-2005 इन्डिया टेक फाउन्डेशन की ओर से ऊर्जा क्षेत्र में सुधार और नवीनता के लिए इन्डिया टेक्नोलोजी एक्सेलन्स अवार्ड दिया गया।

30-01-2006 इन्डिया टुडे द्वारा देश व्यापी स्तर पर कराये गये सर्वेक्षण में श्री नरेन्द्र मोदी देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री चुने गये।

23-03-2006 सेनिटेशन सुविधाओं के लिए केन्द्र सरकार द्वारा गुजरात के कुछ गाँवों को निर्मल ग्राम पुरस्कार दिये गये।

31-07-2006 बीस सूत्रीय कार्यक्रम के अमलीकरण में गुजरात एक बार फिर प्रथम स्थान पर रहा।

02-08-2006 सर्व शिक्षा अभियान में गुजरात देश के 35 राज्यों (28+7) में सबसे प्रथम क्रमांक पर रहा।

12-09-2006 अहल्याबाई नेशनल अवार्ड फंक्शन, इन्दौर की ओर से पुरस्कार।

30-10-2006 चिरंजीवी योजना के लिए 'वोल स्ट्रीट जर्नल' और 30-10-2006 चिरंजीवी योजना के लिए 'वोल स्ट्रीट जर्नल' और 'फाइनान्सियल एक्सप्रेस' की ओर से (प्रसूति समय जच्चा-बच्चा मृत्यु दर कम करने ले लिए) सिंगापुर में 'एशियन इन्नोवेशन अवार्ड' दिया गया

04-11-2006 भू-रिकार्ड्स के कम्प्यूटराइजेशनके लिए चल रही ई-धरा योजना के लिए ई-गवर्नन्स पुरस्कार।

10-01-2007 देश के सबसे श्रेष्ठ ई-गवर्न्ड राज्य का ELITEX 2007- पुरस्कार भारत की केन्द्र सरकार की ओर से प्राप्त।

05-02-2007 इन्डिया टुडे-ओआरजी मार्ग के देशव्यापी सर्वेक्षण में तीसरी बार श्रेष्ट मुख्यमंत्री चुने गये। पाँच साल के कार्यकाल में किसी भी मुख्यमंत्री के लिए यह अनोखी सिद्धि थी। आग की तरहा फैला दो इस खबर को शेयर शेयर नरेंद्र मोदी जी के फैन्स फैलादो इस न्यूज़ को आग की तरहा सिर्फ दो सेकंड देकर।

मोदीजी ने कहा है की वे यदि सत्ता में आते है तो इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स, एक्साइज ड्यूटी आदि को ख़त्म कर देंगे। और बैंक
ट्रांजेकशन पर 1 से 1.5% ट्रांजेकशन लगाया जायेगा।अब आप सोचेंगे की इस तरह टैक्स ख़त्म कर देने से देश कैसे चलेगा।इन टैक्सो से हमारे देश को 14 लाख करोड़ की आमदनी होती है जिससे देश का बजट बनता है। इसके बदले बैंक ट्रांजेकशन पर 1से 1.5% चार्जेज लगाया जायेगा जिससे देश को 40लाख करोड़ की आमदनी होगी जो की मोजूदा बजट से लगभग 3गुना है। जो आगे बढकर 60 लाख करोड़ हो जाएगी। अब आप सोचे जब इनकम टैक्स,सेल्स टैक्स,एक्साइज ड्यूटी,नही होगी तो आप ही सोचिये आपको टेक्सो की चिंता नही होगी। आपको बिल बुक्स आदि नही रखना पड़ेगा। सारा काम 1 नम्बर में होगा सारी इनकम व्हाइट में होगी। बुक्स आपको रखने की झंझट नहीं रहेगी। सारी काली कमाई सफ़ेद हो जाएगी। और आप भी निश्चिंत हो जायेंगे। इसके साथ ही मोदीजी ने ये भी कहा है की 1000/- 500/-के नोट भी बंद किये जायेंगे और इलेक्ट्रोनिक करेंसी को तरजीह दी जाएगी ताकि अधिकतम कार्य बैंक के द्वारा किये जाये। इन विभागों के कर्मचारियों को इंडिया इन्फ्रा डेवलपमेंट के तहत देश में बुनियादी सुविधाओ का विकास करेंगे। यदि मोदीजी सत्ता में आते है तो आप ही सोचिये देश का चोतरफा विकास होगा। भारत को विश्व बैंक से लोन लेने की आवश्यकता नही होगी। भारत फिर विश्व गुरु बनेगा। यदि आप भी मोदीजी के इस नज़रिए से सहमत है तो आप भी इस मोदीजी के नज़रिए को हर उस नागरिक तक पहुचाये जो देशभक्त है।

नमो नमो.......

जय हिन्द...

Friday, December 27, 2013

सत्यमेव जयते-जीत सिर्फ सत्य की होती है



प्रकृति का नियम है कि जीत सिर्फ सत्य की होती है -सत्यमेव जयते। हमारी न्यायपालिका ने जब इस हकीकत की अभिव्यक्ति की है, मुझे ये उचित लगता है कि देश के लोगों के सामने अपने मन के विचारों और भावनाओं को रखूं।

इस प्रकरण का अंत आने के साथ ही शुरुआत की यादें उभर रही हैं। 2001 के भयावह भूकंप ने गुजरात को मृत्यु और विनाश के साथ ही असहाय हो जाने की भावना से भर दिया था। सैंकड़ों लोगों की जान गई थी। लाखों लोग बेघर हो गये थे। समूचा जनजीवन प्रभावित हुआ था, आजीविका के साधन नष्ट हो गये थे। इस तरह की अकल्पनीय त्रासदी वाले भयावह क्षणों में मुझे लोगों के घावों पर मलहम लगाने और पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी। और हमने पूरी ताकत से इस चुनौती का मुकाबला करने में अपने को झोंक दिया था।

हालांकि महज पांच महीनों के अंदर हमें एक और अप्रत्याशित झटका लगा, 2002 की अमानवीय हिंसा के तौर पर। निर्दोषों की जान गई। परिवार असहाय बने। वर्षों की मेहनत के बाद जो संपत्ति बनाई गई थी, वो नष्ट हुई। प्रकृति की तबाही के बाद अपने पांव पर खड़े होने के लिए संघर्ष कर रहे गुजरात के लिए ये एक और भयावह झटका था।

मेरी अंतरात्मा ऐसी गहन संवेदना से भर गई थी, जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। दुख, पीड़ा, यातना, वेदना, व्यथा- ऐसे किसी भी शब्द से उन भावों की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। वो हृदय विदारक घटना थी, उस अमानवीय और दुर्भाग्यपूर्ण घटना को याद करने पर आज भी कंपकंपी छूट जाती है।

एक तरफ भूकंप पीड़ितों का दर्द था, तो दूसरी तरफ दंगा पीड़ितों का। इस परिस्थिति का पूरी ताकत से सामना करते हुए मेरे लिए ये जरूरी था कि अपनी निजी पीड़ा और व्यथा को किनारे रखते हुए, भगवान ने जितनी भी ताकत मुझे दी है, उसका इस्तेमाल करते हुए मैं शांति, न्याय और पुनर्वास के काम को कर सकूं।

उस चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में, मुझे प्राचीन ग्रंथों में लिखे हुए वो विचार अक्सर याद आते थे कि जो लोग सत्ता के शीर्ष स्थानों पर बैठे हैं, उन्हें अपनी पीड़ा और व्यथा को किसी और के साथ बांटने का अधिकार नहीं है। उन्हें अकेले ही उसे भुगतना पड़ता है। मेरे साथ भी ऐसा ही रहा, अपनी व्यथा का अनुभव करता रहा, जो काफी तीव्र थी। दरअसल, जब भी मैं उन दिनों को याद करता हूं, मैं ईश्वर से एक प्रार्थना जरुर करता हूं। वो ये कि ऐसे क्रुर और दुर्भाग्यपूर्ण दिन किसी भी दूसरे व्यक्ति, समाज, राज्य या देश को नहीं देखने पड़ें।

ये पहली बार है, जब मैं उस भयावह पीड़ा को बांट रहा हूं, जो उन दिनों में मैंने व्यक्तिगत तौर पर महसूस किया।

उन्हीं भावनाओं के साथ मैंने गोधरा ट्रेन आगजनी कांड के दिन ही गुजरात के लोगों से शांति और धैर्य की अपील की थी, ये सुनिश्चित करने के लिए कि निर्दोष लोगों की जान पर किसी किस्म का खतरा न पैदा हो। मैंने यही बात फरवरी-मार्च 2002 के उन दिनों में मीडिया के साथ अपने रोजाना मुलाकात के दौरान भी कही। मैंने जोर देकर कहा था कि सरकार की न सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है कि वो शांति बनाए रखे, लोगों को न्याय दिलाए और हिंसा के दोषियों को सजा दिलाए। यही बात मैंने हाल के सदभावना उपवासों के दौरान भी कही कि किसी भी सभ्य समाज को इस तरह के घृणित कृत्य शोभा नहीं देते और इनसे मुझे कितनी पीड़ा हुई थी।

दरअसल, बतौर मुख्यमंत्री मेरे कार्यकाल की शुरुआत से ही मेरा इस बात के लिए जोर रहा कि कैसे एकता की भावना को सुदृढ किया जाए। इसी बात को मजबूती से रखने के लिए मैंने नया शब्द प्रयोग शुरु किया - मेरे पांच करोड़ गुजराती भाइयों और बहनों।

एक तरफ जहां मैं पीड़ा को झेल रहा था, वही दूसरी तरफ मुझ पर, मेरे अपने गुजराती भाइयों और बहनों की मौत और उन्हें नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया। क्या आप मेरे मन के अंदर के भावों और उद्वेग का अंदाजा लगा सकते हैं, जिन घटनाओं की वजह से मुझे इतनी पीड़ा हुई, उन्हीं घटनाओं को करवाने का आरोप मेरे उपर लगाया गया।

कई वर्षों तक लगातार मेरे उपर आरोप लगाये जाते रहे, कोई मौका नहीं छोड़ा गया मुझ पर हमला बोलने का। मुझे इस बात से और अधिक पीड़ा हुई कि जिन लोगों ने अपने निजी और राजनीतिक स्वार्थ को साधने के लिए मेरे उपर हमला किया, उन्होंने मेरे राज्य और देश की छवि भी धूमिल की। जिन घावों को भरने की हम पूरी ताकत से कोशिश कर रहे थे, उन्हीं घावों को बेरहम तरीके से लगातार कुरेदने की कोशिश की जाती रही। दुर्भाग्यपूर्ण तो ये रहा कि ऐसे तत्व जिन लोगों की लड़ाई को लड़ने का नाटक कर रहे थे, उन्हीं पीड़ितों को जल्दी न्याय मिलने में इन्होंने बाधा पैदा की। इन्हें ये महसूस भी नहीं हुआ होगा कि जो लोग पहले ही दर्द को भुगत रहे हैं, उनकी परेशानी को इन्होंने और कितना बढ़ाया है।

बावजूद इसके गुजरात ने अपना रास्ता चुना। हमने हिंसा के उपर शांति को चुना, विखंडन की जगह एकता को चुना, घृणा के उपर सदभाव को चुना। ये काम आसान नहीं था, लेकिन हम लंबे मार्ग पर चलने के लिए तैयार थे। अनिश्चितता और भय के माहौल से आगे बढ़कर मेरा गुजरात शांति, एकता और सदभावना की मिसाल के तौर पर उभरा। आज मुझे इस बात का संतोष है और मैं इसके लिए हरेक गुजराती को श्रेय देता हूं।

गुजरात सरकार ने हिंसा से निबटने के लिए जिस तेजी और निर्णायक ढंग से काम किया, वैसा देश में कभी किसी दंगे के दौरान देखने को नहीं मिला था। कल का फैसला उस न्यायिक समीक्षा प्रक्रिया का पूरा होना है, जो देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई थी। बारह वर्षों तक गुजरात ने जो अग्नि परीक्षा दी है, वो अब पूर्ण हुई है। मैं आज राहत और शांति महसूस कर रहा हूं।

मैं उन सभी लोगों का आभारी हूं, जिन्होंने इस चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में मेरा साथ दिया, जो झूठ और पैंतरेबाजी के बीच सच्चाई को समझ पाए। अब जबकि दुष्प्रचार के बादल छंट चुके हैं, मैं उम्मीद करता हूं कि जो लोग असली नरेंद्र मोदी को समझना और साथ में जुड़ना चाहते हैं, उनके हौसले और मजबूत होंगे।

जो लोग दूसरों को दर्द देकर ही संतोष हासिल करते हैं, वो मुझ पर हमला करने का सिलसिला बंद नहीं करेंगे। मैं उनसे ये उम्मीद भी नहीं करता हूं। लेकिन मैं पूरी नम्रता के साथ उनसे अपील करता हूं कि कम से कम अब वो गुजरात के छह करोड़ लोगों को गैरजिम्मेदाराना तरीके से बदनाम न करें।

दर्द और क्षोभ के इस सिलसिले से आगे बढ़ते हुए मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं मेरे दिल में कोई कड़वाहट न आने दें। मैं इस फैसले को न तो व्यक्तिगत जीत के तौर पर देखता हूं, न ही हार के तौर पर, और मेरे सभी मित्रों और खास तौर पर विरोधियों से अपील है कि वो भी ऐसा न करें। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के वक्त भी मेरी यही सोच थी। मैंने 37 दिनों तक सदभावना उपवास किया था और उसके जरिये सकारात्मक फैसले को रचनात्मक कार्य में तब्दील किया था, समाज में एकता और सदभावना को मजबूत करने का काम किया था।

मैं इस बात को पूरी गंभीरता से महसूस करता हूं कि किसी भी समाज, राज्य या देश की प्रगति सदभावना और भाइचारे में है। ये वो आधार है, जिस पर विकास और समृद्धि हासिल की जा सकती है।इसलिए मैं सभी लोगों से अपील करता हूं कि साथ मिलकर हम ये लक्ष्य हासिल करें, प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर खुशी सुनिश्चित करने का काम करें।

एक बार फिर से, सत्यमेव जयते!

वंदे मातरम!
नरेंद्र मोदी



प्रदेश महासचिव कुलजीत चहल पर पार्टी और वरिष्ठ नेताओं की छवि धूमिल करने के गंभीर आरोप

प्रदेश महासचिव कुलजीत चहल पर प्रदेश महासचिव कुलजीत चहल पार्टी और वरिष्ठ नेताओं की छवि धूमिल करने के गंभीर आरोप बीते 20 साल से सत्ता का बनवा...