Monday, February 13, 2012

सोनी सोरी का पत्र और उसके नौ सवाल...

सोनी सोरी
सोनी सोरी 
(सोनी सोरी ने तीन फरवरी को एक खुला पत्र लिखकर अपनी आपबीती और दर्द को लोगों के सामने रखा है. सोनी सोरी के इस स्वहस्ताक्षरित पत्र को हम यहाँ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं. इस पत्र में सोनी सोरी के उत्पीड़न की दास्तां देहलाती भी है .)


आप सब सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवी संगठन, मानवाधिकार महिला आयोग, देशवासियों से एक आदिवासी पीड़ित लाचार महिला अपने ऊपर हुए अत्याचारों का जवाब मांग रही है और जानना चाहती है कि –
(1) मुझे करंट शार्ट देने, मुझे कपड़े उतारकर नंगा करने या मेरे गुप्तांगों में बेदर्दी के साथ कंकड-गिट्टी डालने से क्या नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जायेगी. हम औरतों के साथ ऐसा अत्याचार क्यों, आप सब देशवासियों से जानना है.
(2) जब मेरे कपड़े उतारे जा रहे थे उस वक्त ऐसा लग रहा था कोई आये और मुझे बचा ले, पर ऐसा नहीं हुआ. महाभारत में द्रौपदी ने अपने चीर हरण के वक्त कृष्णजी को पुकारकर अपनी लज्जा को बचा ली. मैं किसे पुकारती, मुझे तो कोर्ट-न्यायालय द्वारा इनके हाथो में सौंपा गया था. ये नहीं कहूँगी कि मेरी लज्जा को बचा लो, अब मेरे पास बचा ही क्या है? हाँ, आप सबसे जानना चाहूंगी कि मुझे ऐसी प्रताडना क्यों दी गयी.
(3) पुलिस आफिसर अंकित गर्ग एसपी मुझे नंगा करके ये कहता है कि 'तुम रंडी औरत हो, मादर सोद गोंड इस शरीर का सौदा नक्सली लीडरों से करती हो. वे तुम्हारे घर में रात-दिन आते हैं, हमें सब पता है. तुम एक अच्छी शिक्षिका होने का दावा करती हो, दिल्ली जाकर भी ये सब कर्म करती हो. तुम्हारी औकात ही क्या है, तुम एक मामूली सी औरत जिसका साथ इतने बड़े-बड़े लोग देंगे.'
आखिर पुलिस प्रशासन के आफिसर ने ऐसा क्यों कहा. इतिहास गवाह है कि देश की लड़ाई हो या कोई भी संकट, नारियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है. झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया था. इंदिरा गांधी ने देश की प्रधानमंत्री बनकर देश को चलाया तो क्या उन्होंने खुद का सौदा किया. आज जो महिलाएं हर कार्य क्षेत्र में आगे होकर कार्य कर रही हैं क्या वो भी अपना सौदा कर रही हैं. हमारे देशवासी तो एक दूसरे की मदद-एकता से जुड़े हैं, फिर हमारी मदद कोई क्यों नहीं कर सकता. आप सभी से इस बात का जवाब जानना चाहती हूँ.
(4) संसार की श्रृष्टि किसने की. बलशाली, बुद्धिमान योधाओं का जन्म किसने दिया है. यदि औरत जाति न होती तो क्या देश की आजादी संभव थी. मैं भी तो एक औरत ही हूँ, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया.
(5) मेरी शिक्षा को भी गाली दी गयी. मैंने एक गांधीवादी स्कूल माता रुक्मणि कन्या आश्रम डिमरापाल में शिक्षा प्राप्त की है. मुझे अपनी शिक्षा की ताकत पर पूरा विश्वास है, जिससे नक्सली क्षेत्र हो या कोई और समस्या फिर भी शिक्षा की ताकत से सामना कर सकती हूँ. मैंने हमेशा शिक्षा को वर्दी और कलम को हथियार माना है. फिर भी नक्सली समर्थक कहकर मुझे जेल में डाल रखा है. बापूजी के भी तो ये ही दो हथियार थे. आज महात्मा गांधी जीवित होते तो क्या उन्हें भी नक्सल समर्थक कहकर जेल में डाल दिया जाता. आप सभी से इसका जवाब चाहिए.
(6) ग्रामीण आदिवासियों को ही नक्सल समर्थक कहकर फर्जी केस बनाकर जेलों में क्यों डाला जा रहा है. और लोग भी तो नक्सल समर्थक हो सकते हैं. क्या इसलिए क्योंकि ये लोग अशिक्षित हैं, सीधे-सादे जंगलों में झोपडियां बनाकर रहते हैं या इनके पास धन नहीं है या फिरअत्याचार सहने की क्षमता है. आखिर क्यों?
(7) हम आदिवासियों को अनेक तरह की यातनाएं देकर, नक्सल समर्थक, फर्जी केस बनाकर, एक-दो केसों के लिये भी ५-6 वर्ष से जेलों में रखा जा रहा है. न कोई फ़ैसला, न कोई जमानत, न ही रिहाई. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है. क्या हम आदिवासियों के पास सरकार से लड़ने की क्षमता नहीं है या सरकार आदिवासियों के साथ नहीं है. या फिर ये लोग बड़े नेताओं के बेटा-बेटी, रिश्तेदार नहीं हैं इसलिए. कब तक आदिवासियों का शोषण होता रहेगा, आखिर कब तक. मैं आप सभी देशवासियों से पूछ रही हूँ, जवाब दीजिये.
(8) जगदलपुर, दंतेवाड़ा जेलों में 16 वर्ष की उम्र में युवक-युवतियों को लाया गया, वो अब लगभग २०-21 वर्ष के हो रहे हैं. फिर भी इन लोगों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है. यदि कुछ वर्ष बाद इनकी सुनवाई भी होती है तो इनका भविष्य कैसा होगा. हम आदिवासियों के साथ ऐसा जुल्म क्यों? आप सब सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी संगठन और देशवासी सोचियेगा.
(9) नक्सलियों ने मेरे पिता के घर को लूट लिया और मेरे पिता के पैर में गोली मारकर उन्हें विकलांग बना दिया. पुलिस मुखबिर के नाम पर उनके साथ ऐसा किया गया. मेरे पिता के गांव बड़े बेडमा से लगभग 20-25 लोगों को नक्सली समर्थक कहकर जेल में डाला गया है, जिसकी सजा नक्सलियों ने मेरे पिता को दी. मुझे आप सबसे जानना है कि इसका जिम्मेदार कौन है? सरकार, पुलिस प्रशासन या मेरे पिता. आज तक मेरे पिता को किसी तरह का कोई सहारा नहीं दिया गया, न ही उनकी मदद की गयी. उल्टा उनकी बेटी को पुलिस प्रशासन अपराधी बनाने की कोशिश कर रही है. मेरे पीती नेता होते तो शायद उन्हें मदद मिलती, वे ग्रामीण और एक आदिवासी हैं. फिर सरकार आदिवासियों के लिये क्यों कुछ करेगी.
छत्तीसगढ़ मे नारी प्रताड़ना से जूझती 
स्व हस्ताक्षरित 
श्रीमती सोनी सोरी (सोढी)


Friday, February 10, 2012

गांधी परिवार का मीडिया परिवार

प्रियंका का मीडिया परिवार
जब से प्रियंका गांधी वाड्रा उतरीं हैं मैदान में,तब से लग रहा है कि यूपी में बाकी नेता प्रचार ही नहीं कर रहे हैं। वैसे प्रियंका ने सिर्फ रायबरेली और अमेठी का जिम्मा संभाला है फिर भी ऐसे बताया जा रहा है जैसे वो पूरे उत्तर प्रदेश में प्रचार कर रही हैं। दिन भर कैमरे पीछा करते है,लाइव दिखाते हैं,फोकस में प्रियंका ही रहती हैं। एक भी कैमरा पैन होकर,लेफ्ट-राइट होकर अमेठी या रायबरेली नहीं दिखाता।
उनकी हर बात बल्कि वही बात बार बार दिखाई जा रही है। अब प्रियंका गांधी ने तो नहीं कहा होगा कि आइये हमारे पीछे-पीछे चलिये। मीडिया खुद ही दरी बिछाकर लेटने के लिए तैयार है तो क्या किया जा सकता है। प्रियंका की राजनीतिक अहमियत तो समझ आती है मगर रॉबर्ट वाड्रा को भी कवरेज की कमी महसूस नहीं हुई होगी। राबर्ट वाड्रा पर मीडिया टूट और टूटा पड़ा रहा।

राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के बीच प्रियंका गांधी एक ख़बर ज़रूर हैं। लेकिन जब यह ज़रूरत निष्ठा में घुलने मिलने लगती है तब समस्या होती है। समस्या उन चिरकुट पत्रकारों को ही होती है जो सत्ता के साथ चुपचाप तालमेल बिठाकर नहीं रहना जानते। अगर आप टीवी पर कवरेज का प्रतिशत निकालें तो प्रियंका के आने के बाद से यह संतुलन गांधी परिवार के पक्ष में ही बैठता है। जितना राहुल को दिखाया जाता है उतना अखिलेश या मायावती को नहीं। मुलायम तो शायद ही कभी-कभी। अजित सिंह भी नज़र नहीं आते। अब इसके लिए गांधी परिवार को क्यों दोष दें? उन्होंने कोई सर्कुलर तो जारी नहीं किया होगा कि अरे भाई आओ,हमीं को दिखाओ। मीडिया सचमुच इस परिवार की सत्ता को सह्रदय स्वीकार करता है। इसलिए नहीं कि बाइट या इंटरव्यू मिलेगा। वो भी किसी को नहीं मिला है। एक्सक्लूसिव तो किसी को नहीं मिला। प्रियंका ने तो झुंड के बीच एकाध बाइट दे भी दिये हैं मगर राहुल गांधी तो हमेशा लांग शाट में ही नज़र आते हैं। इन दोनों में राबर्ट वाड्रा ही मीडिया चतुर निकले। कैमरे और माइक के बीच सहज नज़र आए। आराम से बात करते रहे। उन्हें राजनीति का यह रूट शायद पसंद हो। मगर राहुल गांधी तो बिल्कुल कैमरे वाला रूट पसंद नहीं करते। उन्हें मालूम है कि ये पीछे पीछे आयेंगे ही तो क्यों बुलायें। राहुल बुलाते भी हैं तो एक कमरे में मीडिया को बिठाकर बात करते हैं। खुलकर बात करते हैं। मगर यह भी कह देते हैं कि आपके लिए है,रिपोर्ट करने के लिए नहीं। वहां कैमरे और रिकार्डर नहीं होते हैं। यह अपने आप में मीडिया पर गंभीर टिप्पणी है। राहुल को भरोसा नहीं कि इस तरह की बातचीत को भाई लोग ज़रूरत से अधिक निष्ठा में कुछ का कुछ न बना कर परोस दें। बहुत अजीब लगता है कि जब किसी तिराहे पर ओबी वैन लगे हों और मीडिया प्रियंका के आने का इंतज़ार कर रही हो। वो वहां पांच सौ हज़ार लोगों से मिलकर चली जाती हैं। कैमरा दूसरे लोकेशन पर पहुंचने के लिए सामान समेटने लगता है।

मीडिया के लिए राहुल या प्रियंका को फॉलो करना ग़लत नहीं है। राजनीति के विद्यार्थी और पत्रकार के नाते मैं भी यही करता। लेकिन क्या सारा कैमरा इन पर ही रहेगा? जबकि खुद प्रियंका कह रही हैं कि रायबरेली और अमेठी का चुने हुए विधायकों ने विकास नहीं किया। तब भी कैमरे और रिपोर्टर इसे स्टोरी नहीं समझते। वो एक सस्ता काम करते हैं। दावे के साथ कह सकता हूं एक राजनेता के तौर पर राहुल गांधी जितनी मेहनत करते हैं वो खुद समझ जाते होंगे ऐसी मीडिया को देखकर। सवाल राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा गांधी के कवरेज में संतुलन का है। बाकी नेताओं के साथ ग़ैर गांधी परिवार या ग़ैर करिश्माई व्यवहार नहीं होना चाहिए। ऐसा करने वाले पत्रकार राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कम चाटुकारिता की तलाश वाले ज्यादा लगते हैं।

एक दिन यही राहुल गांधी कह देंगे कि मीडिया अपना काम ठीक से नहीं करता। उसे नेता की नहीं जनता की रिपोर्टिंग करनी चाहिए। देश की हालत दिखानी चाहिए। मीडिया नहीं दिखाता इसलिए उन्हें लोगों के घरों में जाना पड़ता है। क्यों नहीं मीडिया को अखिलेश,मायावती,अजित सिंह में करिश्मा नज़र आता है? क्या ये तीनों बिना करिश्मा के ही राजनीति में डटे हुए हैं? पत्रकारों से समझदार तो राहुल गांधी निकले जो मायावती और कांशीराम की तारीफ कर दी। शायद राहुल गांधी ने कांशीराम से ही सीखा हो कि गंभीर राजनीति करनी है तो ऐसी हल्की और बेपेंदी की मीडिया के भरोसे मत रहो। ज़मीन पर जाओ। धक्के खाओ। इंटरव्यू के चक्कर में मत पड़ो। चार संपादकों के चक्कर में पड़े रहने से अच्छा राहुल को लगता होगा कि बनारस के किसी रेस्त्रां या चाय की दुकान में चाय पी ली जाए। कम से कम उसके आस पास के लोग बात तो करेंगे कि यहां नेता जी आए थे। रही बात मीडिया की तो उन्हें मोबाइल में रिकार्ड कर फुटेज दे दो। एक्सक्लूसिव बनाकर दिखा देंगे। इतना वक्त और संसाधन लगाने के बाद भी एक भी जगह पर राहुल या प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीति की बारीकियों को समझाने वाली रिपोर्ट नहीं दिखी। वो भी शाम को टीवी खोल कर बंद कर देते होंगे कि इतना घूमा मगर ये भाई लोग सिर्फ हमारे आकर्षण में ही खोए रहे।

इसीलिए टीवी के ज़रिये आपको चुनावों की समझ कभी नहीं मिलेगी। आपको कई चैनल और अखबार ढूंढने होंगे तब जाकर पांच से दस प्रतिशत की ही जानकारी मिलेगी। बाकी जो हो रहा है वो कैमरों के बाहर हो रहा है। प्रधानमंत्री कब बनेंगे और राजनीति में कब आयेंगे, पूछने के लिए यही दो सवाल हैं इनके पास। हद है। क्या प्रियंका गांधी वाड्रा राजनीति में नहीं है? नहीं होतीं तो वो पिछले कई बार से चुनाव प्रचार का काम क्यों संभाल रही होतीं? क्या राहुल गांधी बता देंगे कि जी मैं परसों प्रधानमंत्री बनूंगा? वो लालू यादव नहीं हैं कि यह कह दें कि मैं बनना चाहता हूं। अफसोस यही है कि ये सारे चाटुकारिता करके भी राहुल गांधी के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। मीडिया के लिए राहुल गांधी बाइट प्रवक्ता बन कर रह गए हैं। रिपोर्टिंग की लाश पड़ी है। हम सब कुचल कर चले जा रहे हैं।...रवीश कुमार

Thursday, February 9, 2012

भ्रष्टाचार घोटालों के मामले में यू.पी.ए. का रिकार्ड नं.1 है


माचारों के कवरेज के अनुसारबहुसंस्करण वाले अधिकतर दैनिक क्षेत्रीय समाचारपत्र बनते जा रहे हैं। चेन्नई से प्रकाशित होने वाला दि हिन्दू ऐसा समाचारपत्र है जिसके बारे में मेरा मानना है कि देश के किसी भी क्षेत्र की महत्वपूर्ण घटनाएं उसमें पढ़ने को मिलेजरूरी नहीं है। अत: उसका कवरेज‘ वास्तव में राष्ट्रव्यापी है।

मुझे स्मरण है कि स्वतंत्रता के पूर्व जब मैंने पहली बार इस समाचारपत्र को देखा तो मुझे यह एक अनोखा दैनिक प्रतीत हुआ,जिसके मुखपृष्ठ पर कोई समाचार नहीं थेसिर्फ विज्ञापन थे। अंदर के पृष्ठों पर भी बैनर शीर्षक वर्जित माना जाता था।

मेरे एक सहयोगी ने इस तथ्य की ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया कि हाल में हिन्दुस्तान टाइम्स का पहला पृष्ठ भी ऐसा ही बन रहा है। लेकिन जबकि हिन्दू के विज्ञापन वर्गीकृत विज्ञापनों की भांति पुरानी शैली के अनुरूप एक कॉलम में होते थे और हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञापन इन दिनों इतने व्यापक और काफी अधिक राजस्व देने वाले हैं। उदाहरण के लिए गत् शनिवार के अंक में (4 फरवरी, 2012) को पहले और दूसरे पृष्ठ पर ‘7 अपरियल लेमन जूस और 7 अप नेचुरल लेमन फ्लेवर‘ के विज्ञापन प्रकाशित हुए हैं।

हांलाकि मैं जिस संदर्भ में यह विशेष ब्लॉग लिख रहा हूं वह है उसी संस्करण के पहले पृष्ठ पर प्रकाशित दो स्तम्भ का समाचार । समाचार को विज्ञापन‘ के रूप में वर्णित किया गया हैऔर 5 पंक्तियों में कैप्शन इस प्रकार प्रकाशित हुई है:

      फर्स्ट विक्ट्री (First victory)
      डाऊन अण्डर (Down under)
      इण्डिया बीट आस्ट्रेलिया ( India Beat Australia)
      बाय 8 विकेट्स (by 8 wickets)
      इन सेकण्ड T20 (In second T20)

उस दिन लखनऊ में जब मीडिया ने मुझसे स्वामी के केस में सीबीआई ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय के बारे में पूछा तो मैंने कहा यदि इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया के टेस्ट मैचों और एक दिवसीय मैचों में दर्जनों बदनामी वाली पराजयों के बावजूद यदिT-20 की एकमात्र विजय से क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड इतना अति आनंदित हो सकता है कि उसने पेड न्यूज‘ के रूप में समाचार प्रकाशित कराया है तो क्यों नहीं भारत सरकार भी क्रिकेट बोर्ड के उदाहरण को अपनाते हुए हिन्दुस्तान टाइम्स के मुख पृष्ठ पर पी. चिदम्बरम को मिली उल्लेखनीय राहत को विज्ञापन के रूप में प्रकाशित करवातीजोकि भारत सरकार को सर्वोच्च न्यायालय और अनेक उच्च न्यायालयों से न्यायिक आलोचनाओं और भर्त्सना के बाद मिली है।

यदि क्रिकेट के घटनाक्रम को ही आगे बढ़ाया जाएऔर यदि 2G स्पेक्ट्रम घोटाले की श्रृंखला को मैच श्रृंखला माना जाए तो स्पष्ट रूप से जुझारू सुब्रमण्यम स्वामी को मैन ऑफ दि सीरिज‘ माना जाएगा।
***
sub2G स्पेक्ट्रम के संदर्भ मेंसर्वोच्च न्यायालय के उल्लेखनीय निर्णय का मुख्य भाग यह है कि: पूर्व संचार मंत्री ए. राजा द्वारा जारी किए गए 122 लाइसेंस निरस्त किए गए; सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हें गैरकानूनी और असंवैधानिक माना है।

सुब्रमण्यम स्वामी ने घोषित किया है कि वे ट्रायल कोर्ट के फैसले के विरूध्द अपील करेंगे। न्यायपालिका को अब इस मुख्य सवाल का फैसला करना है कि: क्या पूर्व संचार मंत्री ए. राजा शांति के एकमात्र खलनायक हैं और इन धोखाधड़ी भरे सौदों के लिए अकेले जिम्मेदार व्यक्ति हैं?

यदि स्वतंत्र भारत में भ्रष्टाचार के घोटालों का सम्पूर्ण इतिहास लिखा जाए तो मुझे कोई संदेह नहीं है कि इन घोटालों की संख्या और उनके वित्तीय आयामों और या उनकी गंभीरता को लेकर पहले की कोई भी सरकारयूपीए सरकार के संड़ाधभरे रिकार्ड को तोड़ नहीं पाएगी।

औपचारिक रूप से इस सरकार के मुखिया डा0 मनमोहन सिंह हैं लेकिन अब निस्संदेह सभी को यह पता है कि वास्तव में सरकार और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी चला रही हैं!

नीचे ऐसे दस कुख्यात मुद्दों की तालिका दी जा रही है जो दिमाग में उभरते हैं:

1-     कैश फॉर वोट घोटाला‘ जिसने भारत के लोकतंत्र को शर्मसार किया।
2-    2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला केस
3-    राष्ट्रमण्डल खेल घोटाला
4-    क्वातरोची केस
5-    आदर्श हाऊसिंग केस
6-    मुख्य सतर्कता आयुक्त पद पर पी.जे. थॉमस की नियुक्ति
7-    भारत से चुराकर स्विस बैंकों या अन्य टैक्स हेवन्स में ले जाए गए भारत के काले धन को वापस लाने में सरकार की घोर असफलता। काले धन के विरूध्द संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के तहत न केवल अमेरिकाजर्मनी और फ्रांस जैसे बड़े देश अपितु पेरू और नाइजीरिया जैसे छोटे देशों को भी अपना धन वापस लाने में सफलता मिली है।
8-    आईएमडीटी एक्ट के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना के बावजूद बंगलादेश से असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में व्यापक पैमाने पर अवैध घुसपैठ
9-    तेलगी स्टाम्प-पेपर केस
10-पुणे के स्टड-फार्म के मालिक हसन अली वाला काण्ड
***

टेलपीस

इन दिनों पाकिस्तान में एक चुटकला प्रचलन में है: भारत मेंसेना प्रमुख की उम्र सरकार तय करती है।  हमारे देश में सेना प्रमुख सरकार की आयु तय करता है।

लालकृष्ण आडवाणी
नई दिल्ली
8 फरवरी, 2012

Thursday, February 2, 2012

गाँधी परिवार का परिचय...

 फिरोज जहाँगीर गांधी
पारसी मत में एक उपनाम गैंदी भी है जो रोमन लिपि में पढ़े जाने पर गाँधी जैसा ही लगता है। ================== गाँधी परिवार का परिचय जब भी किसी कांग्रेसी अथवा मीडिया द्वारा देशवासियों को दिया गया है अथवा दिया जाता है,तब वह फिरोज गाँधी तक जाकर ही यकायक रुक सा जाता है फिर बड़ी सफाई के साथ अचानक उस परिचय का हैंडिल एक विपरीत रास्ते की और घुमाकर नेहरु वंश की और मोड़ दिया जाता है। फिरोज गाँधी भी अंततः किसी के पुत्र तो होंगे ही। उनके पिता कौन थे ? यह बतलाना आवश्यक नहीं समझा जाता। फिरोज गाँधी का परिचय पितृ पक्ष से काट कर क्यों ननिहाल के परिवार से बार-बार जोड़ा जाता रहा है, यह एक ऐसा रहस्य है जिसे नेहरु परिवार के आभा-मंडल से ढक कर एक गहरे गढे में मानो सदैव के लिए ही दफ़न कर दिया गया है। यह कैसा आश्चर्य है की पंथ निरपेक्षता(मुस्लिम प्रेम) की अलअम्बरदार कांग्रेस के द्वारा भी आखिर यह गर्वपूर्वक क्यों नहीं बतलाया जाता की फिरोज गाँधी एक पारसी युवक नहीं अपितु एक मुस्लिम पिता के पुत्र थे। और फिरोज गाँधी का मूल नाम फिरोज गाँधी नहीं फिरोज खान था जिसको एक सोची समझी कूटनीति के अर्न्तगत फिरोज गाँधी करा दिया गया था। फिरोज गाँधी मुसलमान थे और जीवन पर्यन्त मुसलमान ही बने रहे। उनके पिता का नाम नवाब खान था जो इलाहबाद में मोती महल (इशरत महल) के निकट ही एक किराने की दूकान चलाते थे । इसी सिलसिले में (रसोई की सामग्री पहुंचाने के सिलसिले में) उनका मोती महल में आना जाना लगातार रहता था। फिरोज खान भी अपने पिता के साथ ही प्रायः मोती महल में जाते रहते थे। वहीँ पर अपनी समवयस्क इन्द्रा प्रियदर्शनी से उनका परिचय हुआ और धीरे-धीरे जब यह परिचय गूढ़ प्रेम में परिणत हुआ तब फिरोज खान ने लन्दन की एक मस्जिद में इन्द्रा को मैमूदा बेगम बनाकर उनके साथ निकाह पढ़ लिया। गाँधी और नेहरु के अत्यधिक विरोध किये जाने के फलस्वरूप भी जब यह निकाह संपन्न हो ही गया तब समस्या 'खान' उपनाम को लेकर आ खड़ी हुई। अंततः इस समस्या का हल नेहरु के जनरल सोलिसिटर श्री सप्रू के द्वारा निकाला गया। मिस्टर सप्रू ने एक याचिका और एक शपथ पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करा कर 'खान' उपनाम को 'गाँधी' उपनाम में परिवर्तित करा दिया।इस सत्य को केवल पंडित नेहरु ने ही नहीं अपितु सत्य के उस महान उपासक तथाकथित माहत्मा कहे जाने वाले मोहन दास करम चाँद गाँधी ने भी इसे राष्ट्र से छिपा कर सत्य के साथ ही एक बड़ा विश्वासघात कर डाला। गाँधी उपनाम ही क्यों - वास्तव में फिरोज खान के पिता नवाब खान की पत्नी जन्म से एक पारसी महिला थी जिन्हें इस्लाम में लाकर उनके पिता ने भी उनसे निकाह पढ़ लिया था। बस फिरोज खान की माँ के इसी जन्मजात पारसी शब्द का पल्ला पकड़ लिया गया। पारसी मत में एक उपनाम गैंदी भी है जो रोमन लिपि में पढ़े जाने पर गाँधी जैसा ही लगता है। और फिर इसी गैंदी उपनाम के आधार पर फिरोज के साथ गाँधी उपनाम को जोड़ कर कांग्रेसियों ने उस मुस्लिम युवक फिरोज खान का परिचय एक पारसी युवक के रूप में बढे ही ढोल-नगाढे के साथ प्रचारित कर दिया। और जो आज भी लगातार बड़ी बेशर्मी के साथ यूँ ही प्रचारित किया जा रहा है।...........ये मेरे अपने विचार है...अरबिंद झा 

Thursday, December 22, 2011

मिथला का उत्सव - मिथलोत्सव 2011



मिथिलोत्सव  यानि  मिथला का उत्सव  जो  दिनांक  20.12.2011 को  संध्या  मे  एक  सुन्दर  मिथिला  नाट्य  प्रस्तुत  किया गया  जिसका  मंचन श्री  राम  सेंटरमंडी हाउस  के  सभागार  में किया  गया.

हम  सब  प्रकश झा जी  और  उनके  पूरी  टीम मैलोरंग  को बधाई  देते  है  की  उन्होंने अपने सदप्रयासों से मिलों  दूर  हमें  अपने  मिथलांचल  की मिट्टी  की खुशबू  की याद  दिलाई। इसके लिए उन्हें  कोटि- कोटि प्रणाम  करते  है.

बहुत  सारे  लोग  आये  थे  जिसमे  बाबा-मईयाचाचा-चाचीभैया-भाभी , दीदी-जीजू  और भाई-बहन  सब के  सब पहुंचे  थे लेकिन  इन  सब के बीच  खास  कर  हम  उन बच्चों से  ज्यादा प्रभावित  हुए जो अपनी संस्कृति को देखने  और समझने  के लिए बड़े  ही  उत्सुक  दिखे,इतनी  ठंठ मे बड़ी संख्या  मे वे सब अपने घरों से बाहर निकलकर आये और अपनी  संस्कृति को नजदीक से देखा।

शुरुआत मे जिस तरीके  से  नृत्य  (नेहा  वर्मा ) जी के द्वारा  प्रस्तुत किया गया उसे देख  कर हम भाव-विभोर हो गए  और उनके  इस  नृत्य  के लिए हम उनका  आभार  व्यक्त  करते है.

दरसलललका  पाग एक ऐसी  कहानी  है जो हमारे  बीच हमारे घर , गाँव-देहात  में हमारे यहाँ  के स्त्री की व्यथा  और उसके समर्पण  पर आधारित  है जिसे बहुत  ही सुंदर तरीके से श्री  राजकमल  चौधरी  जी के लेखन  और प्रकाश  झा  जी  के निर्देशन    सब कलाकार  के उपस्थिति  में बहुत ही शानदार तरीके  से प्रस्तुत किया गया जिनके लिए हम उन्हें तहे दिल से बधाई  देते है.

खाश  कर तीरू (ज्योति ) जो ललका पाग ” नाटक  में एक  महत्वपूर्ण  किरदार  को जिस तरीके बखूबी  निभाया। एक पल  ऐसा लगा  की हम उसी  पृष्ठभूमि  में पहुंच  गए। उनके इस किरदार (भूमिका) से सारा सभागार  करतल  ध्वनि (ताली) से गूंज  उठा  और वातावरण मंत्र-मुग्ध  हो गया और उपस्थिति जनसमुदाय ने करतल ध्वनि से लगातार उनका उत्साहवर्द्धन किया.


इस में सबसे  ऐतिहासिक  पल रहा अंशुमाला झा  की वापसीवो एक गंभीर  बीमारी से ग्रस्त  थीं जिससे उबर कर उन्होंने इस मंच  पर वापसी कीजैसे ही  अंशुमाला झा मंच पर  आईं  पूरा सभागार करतल  ध्वनि से गूंज उठा. ये  संयोग  कहें  या अंशुमाला जी की इच्छा  पर इस गायिका  की वापसी इसी  मंच पर हुआ जिस कारण  वो  भी गौरवान्वित महसूस  कर रही  थीं. हम उनके अच्छे स्वास्थ और  लम्बी  उम्र के लिए भगवान से प्राथना करते हैं और चाहते  हैं कि  वो यूं ही हमारे बीच आ के लाखों  अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करती रहें और हमें अपनी  सुन्द आवाज  से मंत्रमुग्ध  करती रहें.

पूरे  मिथिलोत्सव में लोगों  ने भरपूर आनंद  उठाया और पूरा  सभागार  बार- बार करतल ध्वनि (ताली) से गूंजता रहा. ललका पाग नाटक और  क्लास्सिकल डांस  को देख कर बड़ा ही आनंद का अनुभव  हुआ। कार्यक्रम प्रस्तोताओं की तरफ से हमें  विश्वास भी दिलाया  गया की इस तरह के कार्यकर्म और प्रस्तुत  किये जायेंगे  जिसका हम सब को उत्सुकता से इंतजार रहेगा.

मेलोरंग  मे सम्मान सभा  का भी आयोजन किया  गया था  और सम्मान दिया  गयाजो दिए गए वो इस प्रकार  से है 
1)      ज्योतिरीश्वर सम्मान  2011
2)      रंगकर्मी श्रीकांत मंडल सम्मान –2011
3)      रंगकर्मी प्रमिला झा सम्मान –2011
 सम्मान  लेने  वाले रंगकर्मियों  के नाम  इस प्रकार  है:-
A)     रंगकर्मी दयानाथ झा 
B)       रंगकर्मी मुकेश झा 
C)       रंगकर्मी सुधा झा 
इस सम्मान  को पाकर सभी गौरवान्वित  महसूस  कर रहे  थे। सभी ने मैलोरंग की पूरी टीम और जूरी  को धन्यवाद दिया और उन्हें आगे  बढ़ने के लिए अपनी शुभकामना दी.


अंत मे प्रकाश भाईजी  से एक शिकायत  भी है कि जिस सुन्दर तरीके से मिथिलोत्सव शुरू हुआ उसी के विपरीत हो के संपन्न  हुआ. उसमें एक कमी मैथिली विभूति-  विद्यापति जी की रचना को  बड़े बेसुरे  ढंग  से गाया गया ये देख-सुन कर बड़ा  ही दु:खद अनुभव हुआ। उनका  साथ  देने  के लिए कल्पना  मिश्रा भी  थीं  उन्होंने भी बड़ी ही बेसुरी आवाज में गाया जिससे बहुत सारे  लोग नाराज  होकर सभागार छोड़  कर चले  गए.
प्रकाश भाईजी से हमारा अनुरोध है कि आगे से जब  भी इस तरह  का आयोजन करें तो इन छोटी- छोटी बातों  का ध्यान  रखेंगे   जिस से पब्लिक  कार्यक्रम  बीच में छोड़ कर चले न जाएबाकी  “ललका  पाग” मिथिला नाटक  का  सब ने  भरपूर  आनंद  उठाया  और मिथिला नाटक की और प्रस्तुति के लिए उन्हें  शुभकामना  भी दी
जय मिथिला जय बिहार जय भारत (अरबिंद  झा)

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