Friday, February 4, 2011

आसमान ही जिनकी छत है

 
 
 
 
 
सर्दियों के दिनों में उत्तर भारत के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में ठंडी हवाओं का जोर रहता है। इन दिनों लोग ज्यादा से ज्यादा समय घर में दुबककर बिताना पसंद करते हैं। ठंडा कोहरा शहर के ऊपर लिहाफ की तरह बिछा रहता है। लेकिन जो लोग बेघर हैं, उन्हें सर्दियों के क्रूर मौसम में भी अपना जीवन बचाए रखने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। ये कचरा बीनने वाले, मजदूरी करने वाले या रिक्शा चलाने वाले लोग हैं, जो पैसा कमाने के लिए गांव-देहात से शहर चले आए हैं। इनमें वे अभागी महिलाएं भी शामिल हैं, जिन्हें उनके घर से निकाल बाहर किया गया है। वे बच्चे हैं, जो शराबी पिता की मार से बचने के लिए भाग आए हैं। इनमें बूढ़े, बीमार, अपाहिज, मानसिक रोगी सभी तरह के लोग शामिल हैं, जिनके सिर पर आसमान के सिवा कोई दूसरी छत नहीं है।

बहुत कम सरकारें निराश्रितों के लिए सर्दियों में शरणस्थलों का संचालन करती हैं। अब तो उस पुरानी मानवीय परंपरा को भी भुला दिया गया है, जिसके तहत धर्मस्थलों के दरवाजे निराश्रितों के लिए खोल दिए जाते थे। ये बेसहारा लोग खुद ही सूखी लकड़ियां, टहनियां और प्लास्टिक का कचरा बीनकर जलाते हैं और सर्दियों की लंबी रातों से जूझने के लिए खुद को गर्म रखते हैं। इनमें से बहुत थोड़े लोग ही छोटे और लोभी व्यापारियों से अपने लिए रजाई-कंबल खरीद पाते हैं, बाकी लोग नि:शुल्क कंबल बांटने वाले किसी परोपकारी व्यक्ति की दान-दया पर निर्भर रहते हैं। कुछ लोग नशे की मदद से सर्दियों की कठोरता से संघर्ष करने का प्रयास करते हैं। छोटे बच्चे एक-दूसरे के साथ सटकर बैठ जाते हैं और एकजुटता के साथ सर्द हवाओं का मुकाबला करते हैं।

सर्दियों का हर मौसम अपने पीछे निराश्रितों की लाशें छोड़ जाता है। दिल्ली पुलिस ने तो इन लोगों के लिए एक शब्द ही गढ़ दिया है : ‘भिखारी टाइप’। यह शब्द उन लोगों के बारे में बताता है, जो सरकार के लिए कोई अहमियत नहीं रखते। उनकी ठंड से अकड़ चुकी लाशें पोस्टमार्टम की भी हकदार नहीं समझी जातीं। उनकी मौत को इस योग्य भी नहीं माना जाता कि उसके कारणों की जांच-पड़ताल की जाए। सरकारें यह मान चुकी हैं कि गरीबों के प्रति उसके कोई कर्तव्य नहीं हैं। सरकार का कर्तव्य केवल यही है कि वह गरीबों के सिर से छतें छीन ले, उन्हें सार्वजनिक स्थानों से खदेड़ डाले या उन्हें पलायन करने को मजबूर कर दे। नतीजा यह होता है कि ये बेघरबार लोग या तो हरसंभव तरीके से अपनी रक्षा करने को मजबूर हो जाते हैं या फिर सर्दी की सख्ती के आगे दम तोड़ देते हैं। अध्ययनों से पता चला है कि निराश्रितों की मृत्यु की आशंका केवल सर्दियों में ही नहीं, बल्कि पूरे सालभर सामान्य लोगों की तुलना में पांच गुना अधिक होती है।

पिछली सर्दियों में जब दिल्ली सरकार द्वारा कुछ चुनिंदा शरणस्थलों को भी ध्वस्त कर दिया गया और इस कारण गुब्बारे बेचने वाले एक युवक की मौके पर ही मौत हो गई तो हमने सर्वोच्च अदालत को पत्र लिखकर यह मांग की कि हर निराश्रित व्यक्ति को स्थायी आश्रय का न्यूनतम अधिकार दिया ही जाना चाहिए। न्यायाधीशों ने स्थिति की संवेदनशीलता को समझा। बेंच ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि निराश्रितों के लिए आश्रय की व्यवस्था की जाए। महज दो दिन में सरकार ने इतने शरणस्थल बना दिए, जितने कि स्वतंत्रता के बाद के इतने सालों में भी नहीं बनाए जा सके थे। फिर हमने अदालत को पत्र लिखकर बताया कि यह समस्या अकेले दिल्ली की ही नहीं, बल्कि देश के सभी शहरों की है और निराश्रितों के लिए केवल सर्दियों का मौसम ही कठिन साबित नहीं होता, बल्कि उनके लिए गर्मियों और बारिश का मौसम भी एक मुश्किल परीक्षा की तरह होता है। अध्ययनों से पता चला था कि वास्तव में भीषण गर्मी के दिनों में मरने वाले लोगों की तादाद सर्दियों में मरने वाले लोगों से भी अधिक होती है।

इसके बाद सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि सभी बड़े शहरों में निराश्रितों के लिए पर्याप्त संख्या में स्थायी व सुविधायुक्त शरणस्थलों की व्यवस्था की जाए। आदेश के बाद प्रारंभिक तौर पर अधिकांश राज्य सरकारों में भ्रम की स्थिति रही। कई सरकारों के पास ऐसा कोई विभाग तक नहीं था, जो शहरी निराश्रितों के कल्याण और पुनर्वास के लिए उत्तरदायी हो। महाराष्ट्र सरकार ने तो यह भी कहा कि मुंबई जैसे शहर में निराश्रितों के लिए किसी तरह के शरणस्थल के निर्माण के लिए जगह ही नहीं है। गुजरात सरकार ने कहा कि वर्ष 2021 से पहले वह ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कर सकती। दिल्ली के निराश्रितों में सबसे बड़ी तादाद बिहार से आए लोगों की है, लेकिन बिहार की सरकार ने एक शपथ पत्र के द्वारा सर्वोच्च अदालत को लिखित में यह उत्तर दिया कि निराश्रितों को भोजन मुहैया कराने से राज्य में अराजकता की स्थिति तक निर्मित हो सकती है। न्यायाधीशों ने सख्त रवैया अपनाते हुए सभी राज्य सरकारों को अधिक मानवीय दृष्टिकोण अपनाने के लिए निर्देशित किया। हालांकि मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों की सरकारों ने अधिक सकारात्मक रवैया प्रदर्शित करते हुए सर्वोच्च अदालत को आश्वस्त किया था कि उसके आदेशों का पालन किया जाएगा। अलबत्ता एक साल बीतने के बावजूद बहुत कम निराश्रितों को शरणस्थल मुहैया कराए गए हैं, लेकिन कम से कम कुछ योजनाएं तो विचाराधीन हैं।

यह एक गंभीर और विचारणीय स्थिति है। स्वतंत्रता के इतने दशक बाद भी सर्वोच्च अदालत द्वारा सख्त रवैया अख्तियार करने तक किसी राज्य सरकार ने निराश्रितों के संरक्षण के लिए कदम उठाना जरूरी नहीं समझा। हम निराश्रितों के लिए किसी अनुदान की मांग नहीं करते। स्वच्छ और सुरक्षित आवास उनकी न्यूनतम आवश्यकता है, ताकि वे मानवीय गरिमा के साथ अपना जीवन बिता सकें। हमें अपने शहरों को इस तरह नियोजित करना चाहिए कि उसमें रहने और काम करने वाले सभी लोगों के सिर पर एक अदद छत तो हो।

हर्ष मंदर
लेखक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हैं

जैसे को तैसा: चीनी नागरिकों को भी नत्थी वीजा जारी करेगा भारत!

नई दिल्‍ली. भारत और चीन के बीच नत्‍थी वीजा को लेकर जारी जंग और तेज होने के आसार हैं। अरुणाचल प्रदेश के लोगों के लिए नत्‍थी वीजा जारी किए जाने के चीन के कदम पर भारत की ओर से ठोस कदम नहीं उठाए जाने से निराश राज्‍य के लोगों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की है। इन लोगों ने पड़ोसी देश को भी ‘जैसे को तैसा’ की तर्ज पर नत्‍थी वीजा जारी करने की मांग की।

एक अंग्रेजी अखबार ने पीएम से मिलने गए ऑल अरुणाचल प्रदेश स्‍टूडेंट्स एसोसिएशन (आप्‍सू) के सदस्‍यों के हवाले से दावा किया है कि डॉ. सिंह ने उन्‍हें भरोसा दिलाया है कि चीन को 'जैसे को तैसा' की तर्ज पर जवाब दिया जाएगा। हालांकि पीएमओ या विदेश मंत्रालय की ओर से इस बारे में अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है लेकिन आप्‍सू के एक सदस्‍य ताकम तातुंग का कहना है कि उन्‍हें आश्‍वासन मिला है कि यदि चीन हमारे लोगों को नत्‍थी वीजा जारी करना बंद नहीं करेगा तो उसके नागरिकों को नत्‍थी वीजा जारी किया जाएगा। 

अखबार ने विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता विष्‍णु प्रकाश के हवाले से कहा है कि मंत्रालय को पीएम की अरुणाचल के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की जानकारी नहीं है और यह मामला पीएमओ से जुड़ा है। 

आप्‍सू के प्रतिनिधियों की पीएम से मुलाकात की खबरें हाल में मीडिया में आई थीं। तब पीएम की आप्‍सू के प्रतिनिधियों से मुलाकात के दौरान मौजूद केंद्रीय गृह सचिव के हवाले से मीडिया में यही खबर आई थी कि नत्‍थी वीजा का मुद्दा दो महीने में सुलझा लिया जाएगा। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्‍ठ अधिकारी के मुताबिक दोनों देश इस मुद्दे के हल के लिए एक-दूसरे के संपर्क में हैं। 

पिछले दिनों अरुणाचल प्रदेश के दो नागरिकों को चीन द्वारा नत्थी वीजा देने की बात सामने आने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने उस वक्‍त कड़ा विरोध दर्ज किया था लेकिन किसी तरह की ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।

आप्‍सू के प्रतिनिधियों के साथ बैठक में पीएम ने भरोसा दिलाया कि भारत इस मुद्दे पर गंभीरता से नजर रखे हुए है और अरुणाचल का विकास सरकार की पहली प्राथमिकता है। तातुंग ने कहा, ‘पीएम ने कहा कि वह राज्‍य के विकास और अन्‍य मसलों पर नजर रखने के लिए एक मॉनि‍टरिंग कमेटी का गठन भी करेंगे।’  आप्‍सू प्रतिनिधि ने कहा, ‘हमने पीएम से साफ कह दिया है कि यदि केंद्र सरकार अरुणाचल को लेकर स्‍पष्‍ट नीति बनाने में असफल होती है तो राज्‍य के हालात जम्‍मू कश्‍मीर से भी बदतर हो जाएंगे जहां की सीमा पाकिस्‍तान से जुड़ती है। अरुणाचल की सीमा चीन, म्‍यांमार और भूटान से मिलती है और ये सीमाएं पूरी तरह सील नहीं है।’ 

दैनिकभास्‍कर डॉट कॉम ने आप्‍सू के प्रतिनिधियों से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली।

पिछले दिनों अरुणाचल प्रदेश के दो नागरिकों को चीन द्वारा नत्थी वीजा जारी किए जाने का मामला सामने आया था। बीजिंग जा रहे अरुणाचल के दो खिलाडियों को दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अड्डे पर आव्रजन अधिकारियों ने रोक लिया। उनके पास नत्थी वीजा था इसलिए उन्हें उड़ान की अनुमति नहीं मिली।  चीन के फुजियान में 15 से 17 जनवरी के बीच होने वाली वेटलिफ्टिंग ग्रांड प्री में इन्हें शामिल होना था। चीन के भारोत्तोलन संघ के अध्यक्ष मेंगुआंग ने उन्हें बुलाया था। इन दोनों को दिल्‍ली एयरपोर्ट से लौटा दिया गया क्योंकि भारत ऐसे वीजा को मान्यता नहीं देता।

तीन साल पहले हुई थी शुरुआत : चीन ने नत्थी वीजा देने की शुरुआत 2008 से की थी। उसने सबसे पहले जम्मू-कश्मीर के उन क्षेत्रों के लोगों को इस तरह का वीजा देना शुरू किया था जिन्हें वह विवादित मानता है। पासपोर्ट पर अधिकृत सील-मोहर के बजाय अलग कागज पर दिए गए वीजा को नत्थी वीजा कहते हैं।

मुबारक की मिल्कियत 1800 से 3100 अरब रुपये

मिस्र: आर-पार की लड़ाई के लिए तहरीर चौक पर जुटी जनता

काहिरा. मिस्र में राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के खिलाफ जनता का प्रदर्शन शुक्रवार को निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। जनता ने मुबारक को देश छोड़ने के लिए शुक्रवार तक का अल्‍टीमेटम दिया है, लेकिन मुबारक ने आज फिर पद छोड़ने से मना कर दिया। हालांकि खबर यह भी आ रही है कि अमेरिका मुबारक को हटाने के लिए कोई रास्‍ता निकाल रहा है।

प्रदर्शनकारी मुबारक के खिलाफ तहरीर चौक पर बड़ी रैली के लिए जुट गए हैं। इन्‍हें रोकने के लिए सेना पहले से ही मौके पर मुस्‍तैद है। ऐसे में एक बार फिर खूनी संघर्ष से इनकार नहीं किया जा सकता।

ये प्रदर्शन भड़काने में अल कायदा का हाथ होने की आशंका भी मानी जा रही है और यह प्रदर्शन अमेरिका विरोधी प्रदर्शन की शक्‍ल अख्तियार करता लग रहा है। अमेरिका समर्थित सरकार वाले अरब जगत के कई दूसरे देशों में भी लोग जबरदस्त प्रदर्शन कर रहे हैं या करने वाले हैं। 

शुक्रवार को मुबारक ने पद छोड़ने से इनकार करते हुए कहा कि अगर वह पद छोड़ देंगे तो देश में अराजकता का माहौल बन जाएगा। लेकिन अमेरिकी अखबार 'न्‍यूयार्क टाइम्‍स' ने खबर दी है कि ओबामा प्रशासन मुबारक को हटाने का फार्मूला तैयार कर रहा है। इसके तहत उपराष्ट्रपति उमर सुलेमान के नेतृत्‍व में मिस्र में सेना समर्थित सरकार बनेगी।

मिस्र की राजधानी काहिरा और अलेक्जेंड्रिया में लगातार 11वें दिन सरकार विरोधी प्रदर्शनों और मुबारक समर्थक-विरोधियों के बीच सड़कों पर झड़पें जारी रहने के बीच उपराष्ट्रपति सुलेमान ने विरोधियों से बातचीत का नया पैंतरा चला है। सुलेमान ने मुस्लिम ब्रदरहुड को बातचीत करने का न्योता भेजा है। मुस्लिम ब्रदरहुड एक रूढ़िवादी लेकिन अहिंसक संगठन है जो मिस्र में मुबारक की मुखालफत और लोकतंत्र का समर्थन करता रहा है। मुस्लिम ब्रदरहुड ने मंगलवार को उदारवादी मुस्लिम नेता मोहम्मद अलबरदेई को नई सरकार के गठन के लिए बातचीत के लिए नेता चुना था। विपक्ष ने भी एक बयान जारी कर कहा है कि वह मिलीजुली सरकार बनाना चाहता है। 

इस बीच, मुबारक सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। भारत के कई पत्रकारों के अलावा दुनिया के कई देशों के पत्रकारों को मिस्र की सेना ने घंटों हिरासत में रखने के बाद छोड़ा है। भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के अलावा अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पत्रकारों पर हमले का विरोध किया है। गुरुवार को मुबारक समर्थकों और विरोधियों के बीच हुई हिंसक झड़पों में 8 लोग मारे गए। काहिरा के तहरीर चौक पर मुबारक समर्थकों और विरोधियों के बीच झड़पों के दौरान गोली लगने से इन लोगों की मौत हुई।

इन प्रदर्शनों में शिरकत के लिए अल कायदा से जुड़ी वेबसाइट मुस्लिम.नेट ने विदेशी युवाओं से मिस्र में आकर ‘जिहाद’ में शामिल होने की अपील की है। वेबसाइट ने अपील की है, 'भाइयों, मिस्र में अत्याचार का खात्मा इस धरती से अत्याचार का खात्मा है। कुर्बानी देने का यही वक्त है।' यही वजह है कि इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे अल कायदा का हाथ होने की आशंका को हवा मिल रही है।  'ग्लोबल जेहादिज्म' नाम की किताब के लेखक और जेहादी वेबसाइटों पर नज़र रखने वाले जेरेट ब्रैकमैन के मुताबिक, 'हमेशा की तरह अल कायदा का ऑनलाइन मूवमेंट मिस्र संकट को मौके के तौर पर देख रहा है। इस संकट को यह संगठन अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।'

पूरे अरब जगत में फैली आग
सरकार विरोधी प्रदर्शन अरब जगत के उन तमाम मुल्‍कों में होने जा रहे हैं, जहां की सरकार को अमेरिका समर्थन दे रहा है। मुबारक को पिछले तीन दशकों से अमेरिका समर्थन देता रहा है। मिस्र के राष्ट्रपति पर कैदियों के खिलाफ अत्याचार, तानाशाही और मानवाधिकारों के हनन के आरोप लगते रहे हैं। वहीं, ट्यूनिशिया में सत्ता परिवर्तन और मिस्र में जारी प्रदर्शन ने अरब जगत के दूसरे देशों में खलबली पैदा कर दी है। सूडान, जॉर्डन और सीरिया में भी लोग सरकार के विरोध में खड़े हो गए हैं।  

ट्यूनिशिया, मिस्र, जॉर्डन और सूडान जैसे देशों में अमेरिका समर्थित सरकारें शासन में या तो हैं या रह चुकी हैं। अल कायदा और अमेरिका के बीच शत्रुता जगजाहिर है।  अल कायदा ने ही 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका पर हमला किया था, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे। इस हमले के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जंग का ऐलान किया था। अफगानिस्तान में जारी लड़ाई अमेरिका के इसी अभियान का हिस्सा है। अमेरिका की इस जंग की मुस्लिम जगत में आलोचना होती रही है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अरब जगत के इन देशों में विद्रोह भड़काने के पीछे अल कायदा का हाथ है?

Thursday, February 3, 2011

दिल्‍ली की सेक्‍स मंडी में विदेशी भी कर रहे कारोबार, 4 महिलाओं समेत 5 गिरफ्तार

नई दिल्‍ली. दिल्ली पुलिस ने राष्ट्रीय राजधानी में एक बार फिर एक बड़े सेक्‍स रैकेट का भंडाफोड़ करने दावा किया है। क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने कॉल गर्ल्‍स का धंधा करने के आरोप में चार महिलाओं और एक कथित दलाल समेत पांच लोगों को गिरफ्तार किया है। ये सभी विदेशी मूल के हैं।

पिछले हफ्ते (गुरुवार को) ही दिल्‍ली पुलिस ने पांच महिलाओं सहित छह लोगों को गिरफ्तार कर देह व्यापार के एक गिरोह का भंडाफोड़ किया था। पुलिस ने रोहिणी के सेक्टर 16 से पांच महिलाओं और विकास गुप्ता (28) नाम के एक कथित दलाल को गिरफ्तार किया था।

दक्षिण दिल्‍ली में नए साल की पार्टियों की तैयारी कर रहे सेक्स रैकेट में शामिल चार लड़कियों और उनके दलाल को गिरफ्तार किया गया। ये लोग मॉल्स में अपने क्लाइंटों से डीलिंग करते थे।  

दो साल पहले गिरफ्तारी हुई थी अफगानी 'लैला'

दिल्ली पुलिस ने इससे पहले भी सेक्‍स रैकेट में शामिल एक विदेशी महिला को गिरफ्तार कर बड़े गिरोह का भंडाफोड़ किया था। फरवरी 2009 को गिरफ्तार यह महिला उजबेकिस्तान की रहने वाली थी और दिल्ली में अपनी बहन और जीजा के साथ मिलकर सेक्स रैकेट चलाती थी। दिल्ली में जिस्मफरोशी का जाल फैलाने वाली लैला नाम से मशहूर यह महिला दिल्ली समेत कई शहरों में इंटरनेशनल सेक्स रैकेट चला रही थी।

अक्‍टूबर 2009 में दक्षिण दिल्‍ली में ही सेक्‍स रैकेट चलाने वाले गिरोह का भंडाफोड़ हुआ था। इस गिरोह की चार महिला सदस्‍यों को गिरफ्तार किया गया था जिसमें दो विदेशी मूल (रूस) की थीं। अन्‍य दो महिलाओं में एक भोपाल की तो दूसरी दिल्‍ली के ही शालीमार बाग इलाके की रहने वाली थी।

नरेंद्र मोदी गुजरात दंगे भड़काने और सबूत मिटाने के दोषी!

Source: dainikbhaskar.com   |   Last Updated 16:43(03/02/11)
 
 
 
 
नौ साल पहले गुजरात में भड़के सांप्रदायिक दंगों के लिए मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को दोषी करार दिया गया है। गोधरा दंगों पर विशेष जांच दल (एसआईटी) की 600 पन्‍नों की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।

निजी टीवी चैनल ‘हेडलाइंस टुडे’ ने दावा किया है कि यह रिपोर्ट उसके हाथ लगी है। इसके हवाले से चैनल ने कहा है कि गुजरात सरकार ने विश्‍व हिंदू परिषद (वीएचपी) और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा से जुड़े वकीलों को इन मामलों की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील नियुक्‍त किया। मोदी को गोधरा दंगों पर भड़काऊ बयान देने का भी दोषी करार दिया गया है।

एसआईटी की रिपोर्ट में मोदी के इस बयान का भी जिक्र है, जिसमें उन्‍होंने कहा था कि ‘हर क्रिया की बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।’ मोदी को ऐसा बयान देकर दंगों के गंभीर हालात को कमतर आंकने का दोषी पाया गया है। गुजरात सरकार को गुलबर्ग सोसाइटी कांड जैसे मामलों की गंभीरता पर पानी फेरने का दोषी करार दिया गया है।

मोदी को दंगा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा नहीं कर भेदभाव करने का भी दोषी ठहराया गया है। मोदी पर आरोप हैं कि उन्‍होंने अहमदाबाद जैसे दंगा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा नहीं किया जो मुस्लिम बहुल इलाका है जबकि गोधरा का दौरा किया। गुजरात सरकार को दंगे के दौरान गैर कानूनी तरीके से मंत्रियों को पीसीआर वैन में तैनात करने का भी दोषी ठहराया गया है।

एसआईटी रिपोर्ट में गुजरात सरकार को गुजरात दंगों के जुड़े अहम रिकार्ड मिटाने का दोषी करार दिया गया है। मोदी को दंगों के दौरान मुसलमानों पर हमलों के बाद गैर जिम्‍मेदाराना बयान देने और गैर जिम्‍मेदारान रवैया दिखाने का दोषी भी ठहराया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक मोदी 
सांम्‍प्रदायिक मानसिकता और भड़काऊ भाषण देने वाला शख्‍स हैं

विकी खुलासा: भारत-पाकिस्‍तान में परमाणु युद्ध का खतरा

नई दिल्ली. भारत और पाकिस्तान के बीच अगर मौजूदा तनाव जारी रहा तो पड़ोसी मुल्कों के बीच परमाणु युद्ध की आशंका है, जिसमें लाखों लोग मारे जाएंगे। अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन की 2002 की एक रिपोर्ट में भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव के चलते दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध होने की आशंका जताई गई है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि भारत-पाक के बीच परमाणु युद्ध की सूरत में करीब 1.20 करोड़ लोगों के मारे जाने की आशंका है। यह खुलासा खोजी वेबसाइट विकीलीक्स ने किया है। 

इसके मुताबिक एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और यह तनाव कभी भी परमाणु युद्ध का रूप ले सकता है। दुनिया के इस हिस्से में युद्ध की आशंका के चलते कई देशों में परमाणु हथियारों और मिसाइलों की खतरनाक होड़ चल रही है और इससे ऐटमी युद्ध की आशंका बढ़ गई है।

एशिया के जो देश इन दिनों तेजी से ऐटमी हथियार बना रहे हैं, उनमें ईरान, उत्तर कोरिया, सीरिया, पाकिस्तान और चीन शामिल हैं। ऐटमी हथियारों के अलावा ये देश रासायनिक और जैविक (बायोलॉजिकल) हथियारों का विकास भी कर रहे हैं। 

गुप्त राजनयिक दस्तावेजों से यह भी पता चला है कि 2008 में एक परमाणु अप्रसार सम्मेलन में अमेरिका की तरफ से दिए गए बयान में कहा गया था कि दक्षिण एशिया में परमाणु हथियारों और मिसाइलों की होड़ के चलते दुनिया की सबसे घनी आबादी और आर्थिक तौर पर अहम इलाके में युद्ध छिड़ सकता है। 

इसी सम्मेलन में मध्य एशियाई और उत्तर कोरिया जैसे देशों में हथियारों की होड़ को लेकर भी चिंता जताई गई थी। विकीलीक्स द्वारा किए गए खुलासे में यह बात भी सामने आई है कि सीरिया और उत्तर कोरिया रासायनिक और जैविक हथियार बना रहे हैं। लेबनान के आतंकवादी संगठन हिजबुल्लाह का समर्थन करने वाला सीरिया रासायनिक हथियारों का विकास कर रहा है। व्यापक विनाश के हथियारों के निर्माण से जुड़ी सीरिया की एक कंपनी ने दिसंबर, 2008 में दो भारतीय कंपनियों से रिएक्टर, हीट एक्सचेंजर और पंप खरीदने की कोशिश कर रही थी, जिसपर अमेरिका ने आपत्ति जताई थी। 

अमेरिका की तत्कालीन विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस ने भारत स्थित अमेरिकी दूतावास को एक कड़ा संदेश जारी करते हुए निर्देश दिया था कि अमेरिकी राजनयिक भारत से इन सामानों की बिक्री पर रोक लगाने को कहें। राइस ने अपने संदेश में भारत को उस वादे की याद दिलाई जिसमें कहा गया था कि रासायनकि हथियार बनाने में किसी भी देश को कभी भी मदद नहीं करेंगे। इसी तरह से मार्च, 2008 में अमेरिकी राजनयिकों ने चीन सरकार से उत्तर कोरिया को खतरनाक हथियार बेचने वाली कंपनी की जांच करने को कहा था

एक परंपरा पर पूर्ण विराम

जब भारत में गणतंत्र दिवस के समारोह चल रहे थे उसी दिन ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन ने अपने हिंदी बुलेटिन से समाचार प्रसारण की अस्सी वर्षीय परंपरा को पूर्ण विराम लगा दिया। 27 जनवरी को चिली की संसद के अध्यक्ष जार्ज पिजारो सोतो भारत दौरे पर थे। भारत के उपराष्ट्रपति ने अपने आवास पर अंग्रेजी भाषा से उनकी अगवानी की। मेहमान के दुभाषिए ने फौरन टोकते हुए कहा कि हमारे महामहिम को अंग्रेजी समझने में दिक्कत है, क्योंकि चिली की भाषा स्पेनिश है। हम सभी अंग्रेजी को परदेशी भाषा मानते हुए भी उसके माध्यम से व्यवहार करने में प्रतिष्ठा की बात समझते हैं। संभवत: भारत ऐसे चंद देशों में शामिल है जहां आम लोगों के व्यवहार और शासकीय व्यवहार की भाषा अलग-अलग है। भारत की गुलामी काल से ही बीबीसी की हिंदी सेवा का प्रचलन था और विश्व के बहुत से देशों में भारत के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रवासी भारतीयों के अलावा भी लोग हिंदी बुलेटिन सुनने के अभ्यस्त थे। टीवी चैनलों ने पूरे विश्व के आकाश को छेद कर अपना आकार भले बड़ा कर लिया, लेकिन बीबीसी रेडियो से प्रसारित होने वाले समाचारों के श्रोताओं की संख्या में कोई कमी नहीं हुई। बीबीसी हिंदी समाचार का अलग ही क्रेज है। इस बुलेटिन को अर्थाभाव का बहाना बनाकर बीबीसी के प्रबंधकों ने बड़ी संख्या में भारतीय मानस केघाव को गहरा कर दिया है। भारत की आजादी के तुरंत बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का विश्व के नाम संदेश लेने के लिए बीबीसी का संवाददाता गया। गांधीजी हिंदी के लिए आग्रहशील थे और उनका साक्षात्कार हिंदी में ही हुआ। भारत स्थित इस श्रेष्ठ संस्था के प्रतिनिधि मार्क टुली ने न केवल हिंदी सीखी, बल्कि भारत उनके दिल में इतना रस बस गया कि वह सेवानिवृत्त होने के बाद भारत में ही निवास कर रहे। अंग्रेजी के कोख से जन्मी बीबीसी ने अपने बुलेटिन, अपने भाष्य, परिस्थितयों की व्याख्या के माध्यम से जितनी हिंदी की सेवा की उतनी बड़ी सेवा हिंदी में बनने वाली सभी फिल्मों ने भी नहीं की। 1974 में अपै्रल-मई में मुझे पश्चिमी यूरोप के एक देश बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स जाना पड़ा। वहां अंतरराष्ट्रीय समाजवादी युवा सम्मेलन आयोजित था। दूसरे दिन भारत के छात्र-युवा आंदोलन के बारे में लंबा इंटरव्यू लिया। उस इंटरव्यू को भारत में लोगों ने सुना। वह ऐसा दौर था जब आकाशवाणी को लोग आल इंदिरा रेडियो कहकर पुकारते थे। निष्पक्ष टिप्पणी के लिए बीबीसी का ही सहारा लिया जाता था। उस दौर में हिंदी बुलेटिन हिंदी भाषी जनता का सर्वाधिक पसंदीदा माध्यम था। केंद्र सरकार के विरुद्ध आंदोलनों की बाढ़ आ गई थी। बिहार, गुजरात के सघन छात्र आंदोलन, जबलपुर में जनता प्रत्याशी के रूप में शरद यादव की जीत, गुजरात की विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस की पराजय और रेल मजदूरों की ऐतिहासिक हड़ताल के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा प्रधानमंत्री के चुनाव को निरस्त किया जाना वास्तव में क्रांतिकारी स्फुरण का वर्ष था। उसकी याद आते ही एक नया उमंग और जोश पैदा हो जाता है। इन सभी घटनाक्रमों की सच्चाई जानने व समीक्षा के लिए आमजन बीबीसी का ही सहारा लेते थे। इसी दौर में इमरजेंसी लगी। प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई। लोग अपने मूल अधिकारों के लिए अदालत नहीं जा सकते थे। मेरी गिरफ्तारी बलिया में हुई। मेरे बिस्तर में एक छोटा ट्रांजिस्टर था, जिस पर केवल रात का बीबीसी प्रसारण सुना जाता था। जेल के सभी राजनीतिक बंदी बैरक में जमा होते और मैं पूरी बुलेटिन चुपके से सभी बंदी साथियों को सुना देता था। रत्नाकर भारती और ओंकार नाथ श्रीवास्तव की वाकशैली और तथ्यों की सफाई से जेल में निराश-उदास बैठे बंदियों में उत्साह का संचार हो जाता था। सुब्रहमण्यम स्वामी के राज्यसभा में हंगामा खड़ा करने के बाद पलायन की तस्वीर, जार्ज फर्नाडीज और उनके साथियों की हथकड़ी और बेड़ी के साथ कमर में रस्सा बांधकर तीस हजारी कोर्ट में पेशी का वर्णन रोंगटे खड़े करने वाला था। उसके हफ्ते भर बाद कुछ महीनों के बेटे को गोद में लिए जार्ज की पत्नी लैला कबीर ने किस तरह बीबीसी कार्यालय में प्रवेश किया, इसका सीधा प्रसारण किसी मुर्दे को भी संघर्ष के लिए खड़ा कर सकता था। इमरजेंसी के दौर में युवा मन को बीबीसी ने इतना रोमांचित किया कि अन्याय के खिलाफ जीवन भर जेल में रहने का जज्बा लोगों में पैदा हुआ। ऐसे दौर में जब लगता था कि लोकतंत्र का चिराग बुझ जाएगा तब बीबीसी ने अपनी प्रखर शैली से आम जन में साहस और विश्वास पैदा किया। आज बीबीसी के हिंदी बुलेटिन को बंद किए जाने की घोषणा निराशा पैदा करती है। बीबीसी हिंदी बुलेटिन आज भी प्रासांगिक है। देश का बौद्धिक वर्ग, हिंदी सेवी, हिंदी जगत का प्रतिनिधित्व करने वाले संसद सदस्य भारत सरकार को मजबूर करें और बीबीसी के प्रबंधतंत्र पर प्रभाव डालें कि हिंदी बुलेटिन बंद न हो। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)

सतह पर पुराना सवाल

तिब्बती बौद्ध धर्म की सबसे महत्वपूर्ण शख्सियत करमापा लामा के पास से भारी मात्रा में चीनी मुद्रा की बरामदगी से चीन के साथ लामा के संबंध फिर से संदेह के घेरे में आ गए हैं। इसीलिए करमापा लामा को इस बात का खंडन करने को मजबूर होना पड़ा कि वह बीजिंग के एजेंट हैं। दलाई लामा, पंचेन लामा और करमापा लामा तिब्बती बौद्ध धर्म की तीन सर्वोच्च हस्तियां हैं। ये तीनों उन समानांतर संस्थानों के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने इतिहास के कठिन दौर में बार-बार कठिनाइयों को झेला है। तिब्बत पर पकड़ मजबूत करने के लिए चीन ने वरिष्ठ लामा के देहांत के बाद उनके उत्तराधिकारी के अवतरण की परंपरागत प्रक्रिया पर नियंत्रण बना रखा है। 1992 में बीजिंग ने सात वर्षीय उग्येन त्रिनलेय दोरजी को 17वें करमापा लामा के रूप में चुना और उन्हें तिब्बत के त्सुरफु मठ में तैनात कर दिया। करमापा के इस प्राचीन आवास को सांस्कृतिक क्रांति के दौरान करीब-करीब ध्वस्त कर दिया गया था। उनका पहले मान्यता प्राप्त जीवित बुद्ध के रूप में पुनर्जन्म हुआ और इसकी कम्युनिस्ट चीन ने भी पुष्टि की। फिर 1999 में उग्येन दोरजी सनसनीखेज ढंग से नेपाल के रास्ते भारत भाग आए। इस घटना ने पूरे विश्व का ध्यान खींचा। साथ ही जिस आसानी से वह और उनके अनुयायी तिब्बत से भाग निकलने में कामयाब हुए उससे वह लोगों के संदेह के दायरे में भी आ गए। इससे पहले 1995 में, तिब्बतियों द्वारा चुने गए छह साल के पंचेम लामा का चीन के सुरक्षा बलों ने अपहरण कर लिया था और बीजिंग ने अपने पिट्ठू पंचेम लामा की नियुक्ति कर दी थी। यह आधिकारिक पंचेन लामा ही गायब हो गया। अब बीजिंग वर्तमान दलाई लामा, जो 75 साल से अधिक हो चुके हैं और जिनका स्वास्थ्य खराब चल रहा है, के देहावसान का इंतजार कर रहा है, ताकि वह उनके उत्तराधिकारी का चुनाव कर सके। हालांकि दलाई लामा चाहते हैं कि उनका उत्तराधिकारी स्वतंत्र विश्व से चुना जाए। इस प्रकार अब दो विरोधी दलाई लामाओं के उभरने का मंच तैयार हो गया है-एक बीजिंग द्वारा चुना हुआ और दूसरा निर्वासित तिब्बती आंदोलन द्वारा। वास्तव में, पहले ही दो विरोधी करमापा लामा मौजूद हैं। एक की नियुक्ति चीन द्वारा की गई है जो धर्मशाला में दलाई लामा की छत्रछाया में रहता है और दूसरे ने नई दिल्ली में अपनी सक्रियता कायम की है। भारत सरकार ने शांति कायम रखने के लिए दोनों दावेदारों को सिक्किम के रुमटेक मठ से अलग रखा है। इस आलोक में, 11 लाख युआन और भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की खोज से उग्येन दोरजी को लेकर ताजा विवाद खड़ा हो गया है। पुलिस के छापे और उनके नेता से पूछताछ के विरोध में करमापा लामा के समर्थकों ने प्रदर्शन किया, जबकि भारतीय अधिकारियों ने साफ-साफ कहा कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि चीन करमापा लामा का वित्त पोषण कर रहा हो, ताकि वह करमापा के काग्यु पंथ को प्रभावित कर सके, जिसके हाथ में तिब्बत सीमा पर मौजूद अनेक महत्वपूर्ण मठों का नियंत्रण है। हालांकि, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारी का कहना है कि करमापा को चीनी एजेंट या जासूस मानने से स्पष्ट हो जाता है कि भारत चीन के प्रति अविश्वासपूर्ण रवैया रखता है। जु जिताओ नामक यह अधिकारी पार्टी की केंद्रीय समिति के युनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट से जुड़ा है। इस विभाग के तिब्बत प्रखंड के पास मठों की देखरेख और लामाओं में देशभक्ति का जज्बा पैदा करने का जिम्मा है। इसके लिए जरूरत पड़ने पर यह विभाग लामाओं को पुनर्शिक्षित करता है और तिब्बत आंदोलन व भारत-तिब्बत सीमा के दोनों ओर स्थित तिब्बती बौद्ध मठों में दखल बनाए रखता है। हिमालयी क्षेत्र में समुदायों का आपस में ऐतिहासिक रूप से नजदीकी रिश्ता है, किंतु 1951 में चीन के कब्जे के बाद तिब्बत पर चीन द्वारा लोहे के परदे डाल देने से स्थानीय हिमालयी अर्थव्यवस्था और संस्कृति कमजोर पड़ी है। हालांकि अब भी करमापा के काग्यु पंथ के भारत में अत्यधिक प्रभाव में तिब्बती बौद्ध धर्म ही समान सूत्र बना हुआ है। विदेशी मुद्रा की बरामदगी ने 1999 में उठे सवाल को फिर से उछाल दिया है कि क्या दोरजी का भागकर भारत आना चीन द्वारा प्रायोजित था या फिर वह वास्तव में चीन के दमनकारी शासन से परेशान होकर वहां से भाग निकला था। उनके भागने में चीन को अनेक संभावित लाभ हो सकते हैं। चीन को एक लाभ यह हो सकता है कि भारत, भूटान और ताइवान द्वारा वरदहस्त प्राप्त उनके प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ उसका दावा मजबूत हो सके। एक और महत्वपूर्ण कारण यह तथ्य है कि काग्यु पंथ का सबसे पवित्र संस्थान सिक्किम में रुमटेक मठ है, जहां पंथ का सर्वशक्तिशाली व्यक्ति काला मुकुट (टोप) हासिल करता है। माना जाता है कि यह मुकुट देवियों के बालों से बना है और करमापा का प्रतीकात्मक मुकुट है। अगर उग्येन दोरजी तिब्बत में ही रहते तो वह अपने प्रतिद्वंद्वी के हाथों इसे गंवा सकते थे। बीजिंग को इस तथ्य से भी राहत मिल सकती है कि नाजुक तिब्बती राजनीति में इसके करमापा को दलाई लामा का समर्थन हासिल है। दलाई लामा गेलुग स्कूल से संबद्ध हैं और तिब्बती परंपरा के अनुसार करमापा के चुनाव या मान्यता प्रदान करने में उनकी कोई भूमिका नहीं है। फिर भी, विशुद्ध राजनीतिक कारणों से दलाई लामा ने उन्हें अपनी मान्यता प्रदान कर दी है। अंतिम करमापा का निधन 1981 में हुआ था और उसके बाद उत्तराधिकार को लेकर बढ़ते विवाद में तिब्बत बुद्ध धर्म के सबसे संपन्न काग्यु पंथ की करीब सात हजार करोड़ रुपये की संपत्ति के लिए संघर्ष भी शामिल है। दलाई लामा पर निंदात्मक हमलों के विपरीत चीन ने इसके करमापा को न तो अमान्य ठहराया और न ही उसकी निंदा की, जबकि भारत भाग आने से साफ संकेत मिल गया था कि चीन उनकी वफादारी पाने में विफल रहा है। यहां तक कि मंदारिन भाषी उग्येन दोरजी कभी-कभार चीन सरकार की आलोचना करते रहे हैं, फिर भी बीजिंग ने उन पर हमला करने से हमेशा गुरेज किया है। रकम की बरामदगी से उनके प्रतिद्वंद्वी करमापा जरूर खुश हैं और इसे उनका पर्दाफाश बता रहे हैं। वर्तमान दलाई लामा के जाने के बाद दो दलाई लामाओं के संघर्ष में करमापा केंद्रित पहेली, छद्म राजनीति और साजिशों की ही भारत अपेक्षा कर सकता है। चीन के खिलाफ दलाई लामा भारत की सबसे बड़ी पूंजी हैं। भारत को दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चुनाव की सुनियोजित तैयारी करनी चाहिए, नहीं तो वह एक बार फिर मुंह की खाएगा, जैसा कि करमापा प्रकरण में हुआ है। 

सतह पर पुराना सवाल

तिब्बती बौद्ध धर्म की सबसे महत्वपूर्ण शख्सियत करमापा लामा के पास से भारी मात्रा में चीनी मुद्रा की बरामदगी से चीन के साथ लामा के संबंध फिर से संदेह के घेरे में आ गए हैं। इसीलिए करमापा लामा को इस बात का खंडन करने को मजबूर होना पड़ा कि वह बीजिंग के एजेंट हैं। दलाई लामा, पंचेन लामा और करमापा लामा तिब्बती बौद्ध धर्म की तीन सर्वोच्च हस्तियां हैं। ये तीनों उन समानांतर संस्थानों के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने इतिहास के कठिन दौर में बार-बार कठिनाइयों को झेला है। तिब्बत पर पकड़ मजबूत करने के लिए चीन ने वरिष्ठ लामा के देहांत के बाद उनके उत्तराधिकारी के अवतरण की परंपरागत प्रक्रिया पर नियंत्रण बना रखा है। 1992 में बीजिंग ने सात वर्षीय उग्येन त्रिनलेय दोरजी को 17वें करमापा लामा के रूप में चुना और उन्हें तिब्बत के त्सुरफु मठ में तैनात कर दिया। करमापा के इस प्राचीन आवास को सांस्कृतिक क्रांति के दौरान करीब-करीब ध्वस्त कर दिया गया था। उनका पहले मान्यता प्राप्त जीवित बुद्ध के रूप में पुनर्जन्म हुआ और इसकी कम्युनिस्ट चीन ने भी पुष्टि की। फिर 1999 में उग्येन दोरजी सनसनीखेज ढंग से नेपाल के रास्ते भारत भाग आए। इस घटना ने पूरे विश्व का ध्यान खींचा। साथ ही जिस आसानी से वह और उनके अनुयायी तिब्बत से भाग निकलने में कामयाब हुए उससे वह लोगों के संदेह के दायरे में भी आ गए। इससे पहले 1995 में, तिब्बतियों द्वारा चुने गए छह साल के पंचेम लामा का चीन के सुरक्षा बलों ने अपहरण कर लिया था और बीजिंग ने अपने पिट्ठू पंचेम लामा की नियुक्ति कर दी थी। यह आधिकारिक पंचेन लामा ही गायब हो गया। अब बीजिंग वर्तमान दलाई लामा, जो 75 साल से अधिक हो चुके हैं और जिनका स्वास्थ्य खराब चल रहा है, के देहावसान का इंतजार कर रहा है, ताकि वह उनके उत्तराधिकारी का चुनाव कर सके। हालांकि दलाई लामा चाहते हैं कि उनका उत्तराधिकारी स्वतंत्र विश्व से चुना जाए। इस प्रकार अब दो विरोधी दलाई लामाओं के उभरने का मंच तैयार हो गया है-एक बीजिंग द्वारा चुना हुआ और दूसरा निर्वासित तिब्बती आंदोलन द्वारा। वास्तव में, पहले ही दो विरोधी करमापा लामा मौजूद हैं। एक की नियुक्ति चीन द्वारा की गई है जो धर्मशाला में दलाई लामा की छत्रछाया में रहता है और दूसरे ने नई दिल्ली में अपनी सक्रियता कायम की है। भारत सरकार ने शांति कायम रखने के लिए दोनों दावेदारों को सिक्किम के रुमटेक मठ से अलग रखा है। इस आलोक में, 11 लाख युआन और भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की खोज से उग्येन दोरजी को लेकर ताजा विवाद खड़ा हो गया है। पुलिस के छापे और उनके नेता से पूछताछ के विरोध में करमापा लामा के समर्थकों ने प्रदर्शन किया, जबकि भारतीय अधिकारियों ने साफ-साफ कहा कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि चीन करमापा लामा का वित्त पोषण कर रहा हो, ताकि वह करमापा के काग्यु पंथ को प्रभावित कर सके, जिसके हाथ में तिब्बत सीमा पर मौजूद अनेक महत्वपूर्ण मठों का नियंत्रण है। हालांकि, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारी का कहना है कि करमापा को चीनी एजेंट या जासूस मानने से स्पष्ट हो जाता है कि भारत चीन के प्रति अविश्वासपूर्ण रवैया रखता है। जु जिताओ नामक यह अधिकारी पार्टी की केंद्रीय समिति के युनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट से जुड़ा है। इस विभाग के तिब्बत प्रखंड के पास मठों की देखरेख और लामाओं में देशभक्ति का जज्बा पैदा करने का जिम्मा है। इसके लिए जरूरत पड़ने पर यह विभाग लामाओं को पुनर्शिक्षित करता है और तिब्बत आंदोलन व भारत-तिब्बत सीमा के दोनों ओर स्थित तिब्बती बौद्ध मठों में दखल बनाए रखता है। हिमालयी क्षेत्र में समुदायों का आपस में ऐतिहासिक रूप से नजदीकी रिश्ता है, किंतु 1951 में चीन के कब्जे के बाद तिब्बत पर चीन द्वारा लोहे के परदे डाल देने से स्थानीय हिमालयी अर्थव्यवस्था और संस्कृति कमजोर पड़ी है। हालांकि अब भी करमापा के काग्यु पंथ के भारत में अत्यधिक प्रभाव में तिब्बती बौद्ध धर्म ही समान सूत्र बना हुआ है। विदेशी मुद्रा की बरामदगी ने 1999 में उठे सवाल को फिर से उछाल दिया है कि क्या दोरजी का भागकर भारत आना चीन द्वारा प्रायोजित था या फिर वह वास्तव में चीन के दमनकारी शासन से परेशान होकर वहां से भाग निकला था। उनके भागने में चीन को अनेक संभावित लाभ हो सकते हैं। चीन को एक लाभ यह हो सकता है कि भारत, भूटान और ताइवान द्वारा वरदहस्त प्राप्त उनके प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ उसका दावा मजबूत हो सके। एक और महत्वपूर्ण कारण यह तथ्य है कि काग्यु पंथ का सबसे पवित्र संस्थान सिक्किम में रुमटेक मठ है, जहां पंथ का सर्वशक्तिशाली व्यक्ति काला मुकुट (टोप) हासिल करता है। माना जाता है कि यह मुकुट देवियों के बालों से बना है और करमापा का प्रतीकात्मक मुकुट है। अगर उग्येन दोरजी तिब्बत में ही रहते तो वह अपने प्रतिद्वंद्वी के हाथों इसे गंवा सकते थे। बीजिंग को इस तथ्य से भी राहत मिल सकती है कि नाजुक तिब्बती राजनीति में इसके करमापा को दलाई लामा का समर्थन हासिल है। दलाई लामा गेलुग स्कूल से संबद्ध हैं और तिब्बती परंपरा के अनुसार करमापा के चुनाव या मान्यता प्रदान करने में उनकी कोई भूमिका नहीं है। फिर भी, विशुद्ध राजनीतिक कारणों से दलाई लामा ने उन्हें अपनी मान्यता प्रदान कर दी है। अंतिम करमापा का निधन 1981 में हुआ था और उसके बाद उत्तराधिकार को लेकर बढ़ते विवाद में तिब्बत बुद्ध धर्म के सबसे संपन्न काग्यु पंथ की करीब सात हजार करोड़ रुपये की संपत्ति के लिए संघर्ष भी शामिल है। दलाई लामा पर निंदात्मक हमलों के विपरीत चीन ने इसके करमापा को न तो अमान्य ठहराया और न ही उसकी निंदा की, जबकि भारत भाग आने से साफ संकेत मिल गया था कि चीन उनकी वफादारी पाने में विफल रहा है। यहां तक कि मंदारिन भाषी उग्येन दोरजी कभी-कभार चीन सरकार की आलोचना करते रहे हैं, फिर भी बीजिंग ने उन पर हमला करने से हमेशा गुरेज किया है। रकम की बरामदगी से उनके प्रतिद्वंद्वी करमापा जरूर खुश हैं और इसे उनका पर्दाफाश बता रहे हैं। वर्तमान दलाई लामा के जाने के बाद दो दलाई लामाओं के संघर्ष में करमापा केंद्रित पहेली, छद्म राजनीति और साजिशों की ही भारत अपेक्षा कर सकता है। चीन के खिलाफ दलाई लामा भारत की सबसे बड़ी पूंजी हैं। भारत को दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चुनाव की सुनियोजित तैयारी करनी चाहिए, नहीं तो वह एक बार फिर मुंह की खाएगा, जैसा कि करमापा प्रकरण में हुआ है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

संघ के खिलाफ षड्यंत्र की पटकथा लिख रहे हैं राहुल

ठ्ठजागरण ब्यूरो/एजेंसी, लखनऊ/जयपुर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने बुधवार को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस महासचिव व उनके सहयोगी नेता संघ की छवि धूमिल करने के लिए षड्यंत्र की पटकथा लिख रहे हैं। संघ को हिंदू आतंकवाद का जनक बताने के साथ ही आतंकवादी गतिविधियों में गिरफ्तार लोगों को संघ के साथ जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। मालेगांव व अजमेर प्रकरण में जारी जांच को राजनीति प्रेरित बताते हुए संघ ने आरोप लगाया कि सर संघचालक मोहन राव भागवत की हत्या के षड्यंत्र पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। आरएसएस की केंद्रीय समिति के सदस्य और पूर्व प्रवक्ता राम माधव बुधवार को पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि दिलचस्प पहलू यह है कि जांच एजेंसियां भी उसी दिशा में काम कर रहीं हैं जैसा कांग्रेस महासचिव बयान देते हैं। राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत के साथ बातचीत में कहा कि देश को हिंदू आतंकवाद से खतरा है। इसका खुलासा विकिलिक्स ने किया। इससे साफ जाहिर होता है कि जांच एजेंसियां कांग्रेस महासचिव के इशारों पर नाच रहीं हैं। राम माधव ने मालेगांव व अजमेर प्रकरण में जारी जांच को राजनीति प्रेरित बताते हुए आरोप लगाया कि सर संघचालक मोहन राव भागवत की हत्या के षड्यंत्र पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने संघ विरोधी दुष्प्रचार को बेनकाब करने के लिए अवध प्रांत क्षेत्र में छह फरवरी से देशव्यापी संपर्क अभियान शुरू किया जा रहा है। माधव ने बताया कि केंद्र द्वारा कश्मीर में अलगाववाद का समर्थन करने , जेहाद से अधिक हिंदू आतंकवाद को खतरा बताने व अयोध्या प्रकरण के फैसले पर विवाद खड़ा करने के खिलाफ दस हजार स्वयंसेवकों की टोलियां 20 हजार गांवों में जाएंगी। छह से 20 फरवरी तक चलने वाले इस अभियान में घर-घर जाकर पत्रक व पुस्तिका वितरित की जाएंगी। राम माधव ने आरोप लगाया कि मालेगांव प्रकरण मुख्य आरोपी कर्नल पुरोहित व कथित शंकराचार्य पांडेय सर संघचालक मोहन राव भागवत की हत्या करने के षड्यंत्र में लगे थे। जिसके लिए हथियार भी खरीद लिए गए थे। इसकी जानकारी खुफिया विभाग व महाराष्ट्र सरकार की ओर से भी दी गई थी। इसी आधार पर सर संघ चालक को सुरक्षा मुहैया कराई गई। उधर,पांच दिवसीय यात्रा पर अजमेर पहुंचे संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने राजस्थान के वरिष्ठ प्रचारकों के साथ जनजागरण अभियान की रूप-रेखा और नीति पर विचार-विमर्श किया। माना जा रहा है कि दरगाह ब्लास्ट में संघ के प्रचारकों और राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य इन्द्रेश कुमार का नाम आने से संघ अजमेर से ही जागरण अभियान की दिशा तय कर रहा है। अभियान के तहत हिंदू संगठनों, साधु-संतों के नाम बम ब्लास्ट जैसी घटनाओं में जबरन घसीटने का संघ कड़ा विरोध करेगा। अभियान में राम जन्मभूमि, मंदिर निर्माण, कश्मीर में धारा 370 समाप्त करने जैसे मुद्दे भी शामिल किए गए हैं। इधर अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामले में राजस्थान एटीएस ने सक्रियता पहले से अधिक बढ़ाते हुए इन्द्रेश कुमार के निकट माने जाने वाले राजस्थान के संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों एवं भाजपा नेताओं पर निगरानी रखना शुरू कर दिया है। एटीएस शीघ्र ही इन्द्रेश कुमार से भी पूछताछ करेगी।

पीएम के सामने नीतीश ने रखी 16 मांगें

ठ्ठजागरण ब्यूरो, नई दिल्ली बिहार चुनाव के वक्त केंद्रीय मदद को लेकर राजग और कांग्रेस के बीच चलते रहे घमासान में जीत कर आए नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के सामने सोलह मांगे रख दी हैं। बिहार के प्रति केंद्रीय रुख को याद दिलाते हुए उन्होंने राज्य के लिए विशेष दर्जा, कोल लिंकेज, नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना में तेजी लाने जैसी मांगों पर निर्णय लेने का आग्रह किया। जबकि बिहार के योजना आकार में कटौती की चर्चा को पहले ही खत्म करने की कवायद में उन्होंने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से भी मुलाकात की। उन्होंने मंशा जता दी है कि वह योजना में 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी चाहते हैं। नीतीश ने केंद्र को स्पष्ट कर दिया है कि वह पहली मुलाकात को सिर्फ औपचारिकता तक खत्म नहीं होने देंगे। चुनावी जीत के बाद पहली बार बुधवार को प्रधानमंत्री से मिलने पहुंचे नीतीश ने उनके सामने 16 मुद्दे रख दिए। पहली चिंता राज्यों को मिलने वाली बजटीय सहायता को लेकर है। पहले प्रधानमंत्री और बाद में मोंटेक से मिलकर उन्होंने कहा कि बजटीय सहायता घटाने के प्रस्ताव से राज्यों के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी। इसके अलावा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग दोहराई। सूखा भी नीतीश के लिए चिंता का सबब है। लिहाजा पूरी स्थिति बताते हुए उन्होंने कहा कि राज्य की ओर से कृषि मंत्रालय को 6553 करोड़ रुपये का मेमोरेंडम भेजा गया था, लेकिन मिले महज 1459 करोड़। उन्होंने पूरी राशि जल्द जारी करने की मांग की। नीतीश की सूची में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के लिए फंड, नई परियोजनाएं, एनएचडीपी-3 को जल्द पूरा करने जैसी मांगों के साथ साथ औद्योगिक विकास के लिए कोल लिंकेज देने व एथनाल बनाने की स्वीकृति दिए जाने पर विशेष जोर था। नीतीश ने दावा किया कि केंद्र बिहार की इन दो मांगों को मंजूरी दे तो निवेश की गति तेज हो जाएगी। दूसरी तरफ योजना आकार तय होने से पहले ही मोंटेक से मुलाकात कर नीतीश ने राज्य की जरूरतें बता दीं। विशेष दर्जा के साथ साथ उन्होंने बीआरजीएफ फंड, कृषि योजना, गरीबी संख्या तय करने वाली तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के आधार पर खाद्यान्न का आवंटन जैसी मांगे भी रखी। नई पारी में बिजली भी नीतीश की प्राथमिकता में है। लिहाजा बाढ़ में तैयार होने वाले एनटीपीसी से उन्होंने 40 फीसदी बिजली देने का आग्रह किया। अंत में यह भी याद दिला दिया कि 2011-12 के लिए तय बीस हजार के योजना आकार में वह 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी चाहते हैं।

राजा की गिरफ्तारी महज ढकोसला

नई दिल्ली। भाजपा ने गुरुवार को कहा कि ए राजा और सुरेश कलमाड़ी को टूजी स्पेक्ट्रम तथा राष्ट्रमंडल खेल घोटालों में बली का बकरा नहीं बनाया जाए और चूंकि सभी फैसले केंद्रीय मंत्रिमंडल और प्रधानमंत्री ने किए हैं इसलिए संयुक्त संसदीय समिति की जाच से ही पूरी सचाई सामने आ सकती है।
पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यहा कहा कि राजा और अन्य मंत्रियों ने केंद्रीय मंत्रिमंडल और प्रधानमंत्री की अनुमति से ही निर्णय किए। इसलिए देश के सामने इस बात का खुलासा होना चाहिए कि राजा का गाडफादर कौन है और इन घोटालों में और कौन कौन शामिल है। देश की जनता को यह जानने का हक है।
जेपीसी की माग दोहराते हुए उन्होंने कहा, जब तक इससे जाच नहीं कराई जाती है पूरी सचाई सामने नहीं आएगी। गडकरी ने कहा कि जब तक सारी सच्चाई सामने नहीं आती है और अंतिम बिंदु तक की जाच नहीं कराई जाती है राजा की गिरफ्तारी महज ढकोसला होगा।
काग्रेस और संप्रग पर 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन में शामिल होने का आरोप लगाते हुए भाजपा अध्यक्ष ने कहा इनके बिना इतने बड़े पैमाने पर घोटाले होना संभव नहीं था। उन्होंने कहा कि राजा और कलमाड़ी को बली का बकरा बना कर अन्य दोषियों की बेदाग छवि बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। अपनी खाल बचाने के लिए सरकार दूसरों की बलि नहीं दे।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के लिए बराबर का जिम्मेदार बताते हुए उन्होंने कहा कि इसकी नीति के लिए वही जवाबदेह हैं।
गडकरी ने कहा कि 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन के नीतिगत निर्णय के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट है कि मुख्य सचिव ने मंत्रियों के समूह को लिखा था कि मूल्य प्रावधान को हटा दिए जाने से देश को नुकसान होगा। अगर प्रधानमंत्री ने उस समय इस बात को मान लिया होता, तो शायद यह हालात ही पैदा नहीं होते।
प्रधानमंत्री पर 'कुछ दबाव में काम करने' का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि सिंह ने मुख्य सचिव की बात की अनदेखी की जिससे इतना बड़ा घोटाल हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि इस विभाग [दूरसंचार] को केंद्र सरकार ने एक तरह से भ्रष्टाचार करने का लाइसेंस दे दिया। ऐसा लगता है सरकार ने इस विभाग को द्रमुक को आउटसोर्स कर दिया।

Wednesday, February 2, 2011

...जब मोदी के ‘मकड़जाल’ में फंस गए चिदंबरम


नई दिल्ली आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एजेंडे को ही एक नई शक्ल दे दी। उन्होंने सरकार को नक्सली हिंसा, काला धन और राज्यों को हथियार देने तक के मुद्दों पर इस तरह घेरा कि गृह मंत्री पी चिदंबरम को उनका सिलसिलेवार जवाब देना पड़ा। 

इससे यह सम्मेलन अंत में मोदी बनाम चिदंबरम हो गया। मोदी ने अपने आरोपों से सरकार को किस तरह परेशान किया इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गृह मंत्री ने उन्हें यह सलाह भी दे दी कि जो समस्या उनके राज्य में नहीं है उस पर वे न बोलें तो अच्छा है। 

मोदी ने केंद्र सरकार को नक्सल समस्या पर घेरते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा है कि पिछले साल नक्सल अभियान में कम जवानों की मौत हुई जबकि आम नागरिक ज्यादा हताहत हुए। मोदी ने कहा, ‘सरकार को इस पर गर्व नहीं करना चाहिए। यह हमारी जीत नहीं है। यह नक्सलियों की विजय है। 

वह पहले से ज्यादा ताकतवर तो हुए ही हैं, खुफिया सूचना जुटाने की उनकी क्षमता में भी इजाफा हुआ है। वे यह जान गए हैं कि कम हमले करके भी कैसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सकता है।’ मोदी ने इसके साथ ही केंद्र को जर्मनी व ऑस्ट्रिया की ओर से पंजाब, आंध्र प्रदेश, ओडीशा, जम्मू-कश्मीर और गुजरात को हथियारों की सप्लाई न किए जाने के मामले पर भी निशाने पर लिया। 

मोदी ने कहा कि इन दोनों देशों ने कहा कि इन पांच राज्यों में पुलिस मानवाधिकार नियमों के खिलाफ काम करती है। इससे वे उन्हें हथियार नहीं बेचेंगे। मोदी ने कहा कि इन देशों के इस बयान के बाद इन्हें काली सूची में डालने की जगह उल्टे केंद्र सरकार ने राज्यों को सलाह दी कि वह अमेरिका, तुर्की व अन्य देशों से हथियार खरीदें। 

मोदी यहीं नहीं रुके। उन्होंने काले धन पर भी सरकार को घेरा और कहा कि सम्मेलन के एजेंडा पत्र में राज्यों से कहा गया है कि मनी-लॉड्रिंग पर सख्त कदम उठाए। लेकिन जब विदेशों-स्विस बैंक में जमा काले धन की बात की जाती है तो केंद्र सरकार कहती है कि वह टैक्स चोरी का मामला है। 

मोदी ने कहा, ‘सरकार को चाहिए कि वह राज्यों को सलाह देने से पहले अपने स्तर पर उस पर अमल करें।’ नरेंद्र मोदी के इन आरोपों के जवाब में चिदंबरम ने कहा कि प्रधानमंत्री ने आम लोगों की मौत को लेकर संवेदना जताई थी और नक्सल समस्या से सख्ती से निपटने का आहवान भी किया था। ऐसे राज्य जहां नक्सल समस्या नहीं है, वह इसकी गंभीरता नहीं समझ सकते हैं। उन्हें चाहिए कि वह इन मामलों में अपनी सलाह ना दें। 

गृह मंत्री ने कहा कि जहां तक जर्मनी-ऑस्ट्रिया से हथियारों की खरीदारी का मामला है तो अन्य देशों से खरीदारी की सलाह इसलिए दी गई थी कि राज्य उन देशों से हथियार खरीद सकें। इसकी वजह से उनकी पुलिस आधुनिकीकरण की प्रक्रिया प्रभावित न हों। चिदंबरम ने मनी-लॉड्रिंग पर कहा कि एजेंडा पेपर में ऐसा कोई बिंदु नहीं है। हालांकि चिदंबरम के ऐसा कहने के बाद एक बार फिर मोदी ने उन अध्याय के नंबर सार्वजनिक करके केंद्र सरकार को कठघरे मंे खड़ा करने का प्रयास किया जिसमें मनी-लॉड्रिंग विषय शामिल था

2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाला: पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा गिरफ्तार

नई दिल्‍ली. 2 जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले के आरोपी पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा को सीबीआई ने आज आखिरकार गिरफ्तार कर लिया है। राजा के पूर्व सहयोगियों को भी गिरफ्तार किया गया है। इनमें पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरिया और निजी सचिव आर के चंदोलिया को भी गिरफ्तार किया गया है। राजा के भाई के. पेरूमल पर भी सीबीआई ने शिकंजा कसा है। 

इससे पहले राजा सीबीआई के सवालों का जवाब देने के लिए बुधवार सुबह सीबीआई मुख्यालय पहुंचे। इस हफ्ते राजा से यह  दूसरी बार पूछताछ की गई। इससे पहले उनसे 24 और 25 दिसम्बर को भी पूछताछ की गई थी। दूरसंचार मंत्रालय में हुई इस गड़बड़ी का खुलासा करीब तीन महीने पहले हुआ था।

डीएमके नेता राजा के कार्यकाल के दौरान 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन से देश को राजस्व का भारी नुकसान होने का आरोप है। काफी हो हल्‍ले के बाद नवम्बर में राजा ने कैबिनेट से इस्तीफा भी दिया था। हालांकि वह आवंटन प्रक्रिया में किसी भी तरह की अनियमितता से इनकार करते रहे हैं।

2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में हुई गड़बडि़यों की जांच के लिए गठित पाटिल कमेटी ने सीधे तौर पर टेलिकॉम विभाग (डॉट) के सात अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया। इस मामले में पूर्व मंत्री ए. राजा की भूमिका पर यह कहते हुए सवालिया निशान लगाया गया कि राजा ने स्पेक्ट्रम आवंटन में पुरानी नीति पर ज्यादा विचार-विमर्श नहीं किया और उसे जल्दबाजी में लागू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस शिवराज पाटिल ने पिछले दिनों यह रिपोर्ट दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल को सौंपी।

सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले पर नजर रखे हुए है। मामले की छानबीन के बाद सीबीआई को 10 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के सामने स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करनी है। 
सीबीआई के हाथ लगे थे अहम सबूत 

गत दिसम्‍बर में सीबीआई ने राजा के नई दिल्‍ली और चेन्‍नई स्थित आवासों पर छापेमारी की। इस दौरान जांच एजेंसी के हाथ अहम दस्‍तावेज लगे। हजारों करोड़ रुपये के घोटाला मामले में राजा के परिजनों के घर छापेमारी के दौरान पूर्व मंत्री के खिलाफ अहम सबूत हाथ लगे जिनके आधार पर उनके खिलाफ आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाया जा सकता है।

इस मामले में कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया की राजा के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत के मद्देनजर भी राजा से पूछताछ की गई। इस मामले में सीबीआई ने अक्टूबर, 2009 में एफआईआर दर्ज की थी और उसके बाद तलाशी के दौरान जो दस्तावेज बरामद किए गए थे, उन दस्तावेजों के साथ ही राजा का आमना सामना करवाया गया है। 

'बहुत देर हो गई'  

प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने राजा की गिरफ्तारी को देरी से उठाया गया कदम करार दिया है। पार्टी ने कहा है कि राजा की गिरफ्तारी का श्रेय सरकार को नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट को दिया जाता है। भाजपा ने कहा कि राजा की गिरफ्तारी के बावजूद वह इस मामले की जांच जेपीसी से कराने की अपनी मांग पर कायम है।

कांग्रेस ने राजा की गिरफ्तारी पर कहा कि वह 2 जी घोटाले में चल रही जांच में किसी तरह का दखल नहीं करेगी। पार्टी ने यह भी साफ किया कि राजा की गिरफ्तारी से कांग्रेस और डीएमके के रिश्‍ते पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

घोटाले का ए टू जेड

सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला करीब 1.77 लाख करोड़ रुपए का है। सीएजी ने यह आंकड़ा निकालने के लिए 3जी स्पेक्ट्रम आवंटन और मोबाइल कंपनी एस-टेल के सरकार को दिए प्रस्तावों को आधार बनाया है।

दूरसंचार की रेडियो किरणों को सरकार नियंत्रित करती है और अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ से तालमेल बनाकर काम करती है। विश्व में आई मोबाइल क्रांति के बाद कई कंपनियों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया। सरकार ने हर कंपनी को फ्रिक्वेंसी रेंज याने स्पेक्ट्रम का आवंटन कर लायसेंस देने की नीति बनाई।उन्नत तकनीकों के हिसाब से इन्हें पहली जनरेशन(पीढ़ी) याने 1जी, 2 जी और 3जी का नाम दिया गया। हर नई तकनीक में ज्यादा फ्रिक्वेंसी होती हैं और इसीलिए टेलीकॉम कंपनियां सरकार को भारी रकम देकर फ्रिक्वेंसी स्पेक्ट्रम के लायसेंस लेती हैं।

सीएजी रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए राजा ने 2008 में नियमों के उल्लंघन करते हुए 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन किया। इसके लिए उनके विभाग ने 2001 में आवंटन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया को आधार बनाया, जो काफी पुरानी थी। उन्होंने इसके लिए बिना नीलामी के पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर आवंटन किए। इससे 9 कंपनियों को काफी लाभ हुआ। प्रत्येक को केवल 1651 करोड़ रुपयों में स्पेक्ट्रम आवंटित किए गए जबकि हर लायसेंस की कीमत 7,442 करोड़ रुपयों से 47,912 करोड़ रुपए तक हो सकती थी।

हालांकि दूरसंचार विभाग ने पहले आओ पहले पाओ के आधार पर आवंटन किए, लेकिन इसमें भी अनियमितताएं कर, कुछ कंपनियों को सीधा लाभ पहुंचाया। कुल 122 लायसेंस में से 85 अयोग्य और अपात्र कंपनियों को दिए गए। लायसेंस आवंटन में कानून मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के सुझावों को भी दरकिनार कर दिया गया।सीएजी ने 1.77 लाख करोड़ का आंकड़ा निकालने के लिए दो तथ्यों को आधार बनाया। उन्होंने इस साल 3जी आवंटन में मिली कुल रकम और 2007 में एस-टेल कंपनी द्वारा लायसेंस के लिए सरकार को दिए प्रस्ताव के आधार पर यह नतीजा निकाला। 

सीएजी के अनुसार 122 लायसेंस के आवंटन में सरकार को जितनी रकम मिली, उससे 1.77 लाख करोड़ रुपए और मिल सकते थे। इसीलिए यह घोटाला 1.77 लाख करोड़ रुपयों का माना गया। 

Tuesday, February 1, 2011

परमाणु क्षमता में ब्रिटेन को पीछे छोड़ा पाक!

वाशिंगटन। अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा के वर्ष 2009 में सत्ता संभालने के बाद से पाकिस्तान निरंतर परमाणु हथियार विकसित कर रहा है। स्थिति यह है कि पाकिस्तान जल्द ही ब्रिटेन और फ्रांस को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी परमाणु ताकत बन जाएगा।
समाचार पत्र 'न्यूयॉर्क टाइम्स' की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका की नई खुफिया रिपोर्ट में यह आकलन किया गया है कि बराक ओबामा के सत्ता में आने के बाद से पाकिस्तान ने तेजी से अपनी परमाणु क्षमता का विस्तार किया है। वह ब्रिटेन को पीछे छोड़कर दुनिया की पांचवीं बड़ी परमाणु शक्ति बनने की ओर अग्रसर है।
एक अधिकारी का कहना है कि पाकिस्तान के अभी ही इतने परमाणु हथियार हो चुके हैं कि वह भारत का प्रभावी ढंग से प्रतिरोध कर सकता है। अखबार के अनुसार पाकिस्तान के संदर्भ में अगर ये आंकड़े सही हैं तो पाकिस्तान लंबे समय तक एक परमाणु ताकत के रूप में स्थापित रह सकता है। मौजूदा समय में अमेरिका, रूस और चीन विश्व की तीन शीर्ष परमाणु ताकते हैं।
इस संबंध में अमेरिका के विदेश मंत्री पी जे क्राउले ने संवाददाताओं से कहा कि ये आंकड़े गैर सरकारी संगठन की ओर से आए हैं। हम परमाणु मुद्दों विशेषत: पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर टिप्पणी नहीं करते

न्यायिक सक्रियता के निहितार्थ

Source: श्रवण गर्ग   |   Last Updated 00:11(01/02/11)
 
 
 
 
 
 
ऐसा महसूस हो रहा है कि देश को इस समय कोई जनता के द्वारा चुनी गई सरकार नहीं बल्कि न्यायपालिका चला रही है। सरकार नाम की कोई ताकत सत्ता में है और देश का कामकाज भी निपटा रही है ऐसा लगना काफी पहले से बंद हो चुका है। ऐसा महसूस होने देने के पीछे भी सरकार का ही हाथ है। जनता देख रही है कि देश की सेहत से जुड़े अहम मामलों पर फैसले करने अथवा सलाह देने का काम न्यायपालिका के हवाले हो गया है और सरकार अदालती कठघरों में खड़ी सफाई देती हुई ही नजर आती है। संसद ठप-सी पड़ी है और सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता बढ़ गई है। बहस का विषय हो सकता है कि क्या यह स्थिति किसी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित और फायदेमंद है। ऐसा कौन सा मुद्दा है जो आज सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर फैसले के लिए गुहार नहीं लगा रहा है? और सवाल यह भी है कि इन मुद्दों में कौन-सा ऐसा है जिस पर सरकार स्वयं कोई न्यायोचित फैसला नहीं ले सकती है? एक वक्त था जब बहस इस बात पर चलती थी संसद की सत्ता सर्वोच्च है या न्यायपालिका की?

केशवानंद भारती केस में न्यायपालिका की व्यवस्था के बाद सालों साल इस पर बहस भी चली। संसद और न्यायपालिका के बीच अधिकार-क्षेत्र को लेकर कई बार टकराव की स्थितियां भी बनीं। पर आज के हालात देखकर लगता है कि न तो सरकार ही और न ही जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही इतनी दयनीय स्थिति में पहले कभी देखे गए। ऐसे हालात तभी बनते हैं जब सरकार का अपनी ही संस्थाओं पर नियंत्रण खत्म होता जाता है या फिर उसका अपनी जनता पर से भरोसा उठ जाता है। सत्ता में काबिज लोगों को ऐसा आत्मविश्वास होने लगता है कि सबकुछ ठीकठाक चल रहा है और स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है। न तो कोई अव्यवस्था है और न ही कोई भ्रष्टाचार, विपक्षी दलों द्वारा जनता को जान-बूझकर गुमराह किया जा रहा है। दूरसंचार घोटाले पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट को लेकर कपिल सिब्बल जैसे जिम्मेदार केंद्रीय मंत्री द्वारा किया गया दावा और उस पर न्यायपालिका सहित देशभर में हुई प्रतिक्रिया इसका केवल एक उदाहरण है। विभिन्न मुद्दों पर सरकार द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया ठीक उसी प्रकार से है जैसे भयाक्रांत सेनाएं मैदान छोड़ने से पहले सारे महत्वपूर्ण ठिकानों को ध्वस्त करने लगती हैं।

आश्चर्यजनक नहीं कि एक अंग्रेजी समाचार पत्र द्वारा वर्ष 2011 के लिए देश के सर्वशक्तिमान सौ लोगों की जो सूची प्रकाशित की गई है उसमें पहले स्थान पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसएच कापड़िया को रखा गया है। दूसरा स्थान कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को और तीसरा एक सौ बीस करोड़ की आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को प्रदान किया गया है। इस क्रम पर अचंभा भी व्यक्त किया जा सकता है और जिज्ञासा भी प्रकट की जा सकती है। बताया गया है कि मुख्य न्यायाधीश के रूप में श्री कापड़िया आज सुप्रीम कोर्ट की ताकत का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक ऐसे वक्त जब राजनीति का निर्धारण न्यायपालिका के फैसलों/टिप्पणियों से हो रहा है, नंबर वन न्यायाधीश और उनकी कोर्ट देश का सबसे महत्वपूर्ण पंच बन गई है। अयोध्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित फैसले को लेकर जब राजनीति की सांसें ऊपर-नीचे हो रही थीं, बहसें सुनने के बाद उन्होंने यह निर्णय देने में एक मिनट से कम का समय लगाया कि हिंसा फैलने की आशंकाओं को बहाना नहीं बनने दिया जाना चाहिए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय को अपना फैसला सुनाना चाहिए।

चिंता का मुद्दा यहीं तक सीमित नहीं है कि राष्ट्रमंडल खेलों में सरकार की नाक के ठीक नीचे हुए भ्रष्टाचार से लेकर विदेशों में जमा काले धन की वापसी के सवाल तक पिछले महीनों के दौरान जितने भी विषय उजागर हुए उन सबमें सच्चाई सामने आने की संभावनाएं न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बाद ही प्रकट हुईं और ऐसा कोई आश्वासन नहीं है कि जो सिलसिला चल रहा है वह कहीं पहुंचकर रुक जाएगा।

क्या ऐसी आशंका को पूर्णत: निरस्त किया जा सकता है कि लगातार दबाव में घिरती हुई कार्यपालिका किसी मुकाम पर पहुंचकर न्यायपालिका के फैसलों को चुनौती देने, उन्हें बदल देने या उन पर अमल को टालने की गलियां तलाश करने लगे। या फिर न्यायपालिका पर राजनीतिक आरोप लगाए जाने लगें कि वह शासन के कामकाज में हस्तक्षेप करते हुए अग्रसक्रिय (प्रोएक्टिव) होने का प्रयास कर रही है, टकराव की स्थिति इससे भी आगे जा सकती है। ऐसा अतीत में हो चुका है।

अक्टूबर 2009 में जब इटली की 15 सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने व्यवस्था दी कि वहां की संसद द्वारा पूर्व में पारित कानून, जिससे प्रधानमंत्री को उनके खिलाफ चलाए जाने वाले मुकदमों के प्रति सुरक्षा (इम्यूनिटी) प्राप्त होती है असंवैधानिक है तो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सिल्वियो बलरूस्कोनी ने निर्णय को यह कहते हुए चुनौती दे दी कि संवैधानिक पीठ पर वामपंथी जजों का आधिपत्य है। उन्होंने कहा कि ‘कुछ नहीं होगा, हम ऐसे ही चलेंगे।’ उन्होंने कोर्ट को ऐसी राजनीतिक संस्था निरूपित किया, जिसकी पीठ पर 11 वामपंथी जज बने हुए हैं।

न्यायपालिका की संवैधानिक व्यवस्थाओं को तानाशाही तरीकों से चुनौती देने की स्थितियां और कार्यपालिका के कमजोर दिखाई देते हुए हरेक फैसले के लिए न्यायपालिका के सामने लगातार पेश होते रहने की अवस्था के बीच ज्यादा फर्क नहीं है। एक स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं। चूंकि इस समय देश का पूरा ध्यान सरकार व न्यायपालिका के बीच चल रहे संवाद व अदालती व्यवस्थाओं पर केंद्रित है, विपक्ष की इस भूमिका को लेकर कोई सवाल नहीं खड़े कर रहा है कि कार्यपालिका को कमजोर करने में भागीदारी का ठीकरा उसके सिर पर भी फूटना चाहिए। जो असंगठित और कमजोर विपक्ष न्यायपालिका की ताकत को ही अपनी ताकत समझकर आज सरकार के सामने इतना इतरा रहा है वह स्वयं भी कभी आगे चलकर इसी तरह के टकरावों की स्थितियों का शिकार हो सकता है। यह मान लेना काफी दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि देश का राजनीतिक विपक्ष न्यायपालिका के फैसलों और टिप्पणियों में ही अपने लिए शिलाजीत की तलाश कर रहा है।

श्रवण गर्ग
लेखक भास्कर के समूह संपादक हैं

पाकिस्‍तान ने ओबामा को दी खुली चुनौती, परमाणु बमों से बढ़ेगा तनाव!

पाकिस्‍तान ने ओबामा को दी खुली चुनौती, परमाणु बमों से बढ़ेगा तनाव!

Source: agency   |   Last Updated 16:32(01/02/11)
 
 
 
वाशिंगटन. पाकिस्तान अब अमेरिका के लिए सिरदर्द बन रहा है। पाकिस्तान ने अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा के सत्ता संभालने के बाद बड़ी संख्या में चोरी छिपे परमाणु बम बनाए, जबकि अमेरिका विश्व में परमाणु बम के उत्पादन को कम करने का प्रयास कर रहा है। पाकिस्तान में पदस्थ एक अमेरिकी राजनयिक ने पिछले सप्ताह लाहौर में लूट के इरादे से आए दो व्यक्तियों की गोली मारकर हत्या कर दी। इसे लेकर भी दोनों देशों में तनाव है। अमेरिका ने पाकिस्तानी सरकार को कहा कि राजनयिक को जल्दी ही अमेरिका भेजा जाए, लेकिन लाहौर हाई कोर्ट ने मंगलवार को एक आदेश में राजनयिक के देश छोड़ने पर पाबंदी लगा दी। इसी बीच अमेरिकी सरकार ने अपने नागरिकों को जारी अलर्ट में पाकिस्तान न जाने की सलाह दी है।      

पाकिस्तान बड़ी तेजी से परमाणु हथियार बना रहा है और यह मुद्दा अब अमेरिका के साथ तनाव का कारण बन रहा है। पाकिस्तान परमाणु हथियार बनाने के अलावा इसके निर्माण में लगने वाले जरूरी सामान का भी उत्पादन तेजी से कर रहा है। याने भविष्य में भी उसकी और बम बनाने की योजना है। पाकिस्तान यदि इसी गति से हथियार बनाता रहा तो जल्दी ही वह परमाणु क्षमता वाला विश्व का पांचवां सबसे बड़े देश बन जाएगा।

अमेरिका के जाने-माने अखबार न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार पाक की बढ़ती परमाणु क्षमता अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की विश्व में परमाणु हथियार घटाने की नीति के खिलाफ है और इससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है। 

सोमवार को वाशिंगटन पोस्ट ने खुलासा किया है कि पाकिस्तान के पास 100 से ज्यादा न्यूक्लियर हथियार हैं और अधिकांश भारत की सीमा पर तैनात किए गए हैं।

न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार अमेरिका के गुप्तचर विभाग का आंकलन है कि पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों में इजाफा राष्ट्रपति बराक ओबामा के सत्ता में आने के बाद ही किया है। यह ओबामा को खुली चुनौती है क्योंकि ओबामा परमाणु हथियारों की संख्या में बढ़ोतरी का लगातार विरोध कर रहे हैं। अमेरिका के आंकलन के अनुसार ओबामा के सत्ता संभालने के पहले हथियारों की संख्या 75 से 80 के करीब थी लेकिन अब यह संख्या 105 के करीब मानी जाती है।

 अखबार के अनुसार पिछले तीन सप्ताहों में करीब सात देशों ने पाकिस्तान की परमाणु क्षमता के बारे में अमेरिका से चिंता व्यक्त की है। अधिकांश देशों की चिंता परमाणु हथियारों के अलावा हथियारों में इस्तेमाल होने वाले प्लूटोनियम के उत्पादन पर भी है। पाकिस्तान नए प्लूटोनियम रिएक्टर को भी जल्दी ही पूरा करने वाला है, जिसके बाद उसकी परमाणु हथियार बनाने की क्षमता और बढ़ जाएगी। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान परमाणु प्रोजेक्ट के लिए धन कहां से जुटा रहा है, जबकि पूरे देश की आर्थिक स्थिति काफी खराब है।

अमेरिकी राजनयिक को लेकर तनाव

दोनों देशों के बीच पाकिस्तान में एक अमेरिकी राजनयिक को लेकर भी विवाद गहरा गया है, जिसने पिछले सप्ताह लाहौर में गोली चलाकर दो पाकिस्तानी नागरिकों की हत्या कर दी।

अमेरिकी राजनयिक रेमंड्स डेविड ने पिछले सप्ताह लाहौर में गोली चलाकर दो व्यक्तियों को मार दिया था। डेविस का तर्क है कि उसने आत्मरक्षा में गोली चलाई। मारे गए व्यक्ति मोटर साइकल पर सवार थे और उन्हें लूटने के उद्देश्य से आए थे। पुलिस ने हालांकि हत्या का मामला दर्ज कर लिया लेकिन घटना के बाद पाकिस्तान में प्रदर्शन हुए और डेविस को कड़ी सजा देने की मांग की गई। अमेरिका ने हाल ही में पाकिस्तानी सरकार को कहा कि वह डेविस को वापस अमेरिका भेजने की व्यवस्था करे।

एक वकील ने लाहौर हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपील की कि डेविस को वापस नहीं भेजा जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने आज इस मामले की सुनवाई करने के बाद कहा कि डेविस पाकिस्तान के बाहर नहीं जा सकेंगे क्योंकि उसके खिलाफ अपराधिक प्रकरण चल रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि यह भी वही (अदालत) तय करेंगे कि डेविड को राजनयिक होने के कारण स्थानीय कानून के दायरे से बाहर रखने का लाभ दिया जाए या नहीं। अमेरिका ने भले ही पाकिस्तान में करोड़ों डालर का खर्चा किया हो, लेकिन पाक नागरिक उसे नापसंद करते हैं। 

अमेरिका ने नागरिकों को अलर्ट जारी किया
अमेरिका ने आज अपने नागरिकों को कहा है कि आतंकवादी हमलों की आशंका के मद्देनजर पाकिस्तान और भारत की यात्रा से बचें। विदेश विभाग ने कहा कि भारत और पाकिस्तान सहित कई देशों में अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है। अलर्ट में कहा गया है कि भारत में आतंकवादियों ने उन स्थानों को निशाना बनाया है, जहां विदेशी बड़ी संख्या में आते जाते रहते हैं। पाकिस्तान में भी आतंकवादी समूहों ने पश्चिमी देश के नागरिकों पर हमले किए हैं

दूसरा 'मिस्र' बनेगा पाकिस्‍तान: खतरनाक हैं हालात, बगावत पर उतर सकती है जनता


नई दिल्ली. मिस्र और ट्यूनिशिया की तर्ज पर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान भी सुलग सकता है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस (आईएफआरसी) ने मिस्र और ट्यूनिशिया की तर्ज पर पाकिस्तान में भी बवाल शुरू होने की आशंका जताई है। रेड क्रॉस को आशंका है कि पाकिस्तान के बाढ़ से प्रभावित रहे इलाकों में लोग सड़कों पर उतर सकते हैं, जिससे उन इलाकों में तोड़फोड़ और अशांति फैल सकती है। 

गौरतलब है कि ३० साल से सत्ता में काबिज हुस्नी मुबारक के खिलाफ मिस्र में पिछले एक हफ्ते से लोग जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। आज करीब १० लाख लोग मुबारक के खिलाफ मार्च निकाल रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति को शुक्रवार तक देश छोड़ने की चेतावनी दी है। इसी बीच सेना ने भी राष्ट्रपति का साथ छोड़ दिया है। 

पाकिस्‍तान के खराब हालात को देखते हुए आईएफआरसी के अध्यक्ष टाटाडेरू कोनो ने कहा कि पिछले साल बाढ़ से प्रभावित पाकिस्तान के जिलों में राजनीतिक उठापटक की आशंका है। कोनो ने कहा कि यह कहना मुश्किल है कि कब तक लोग महंगाई और खाने-पीने की चीजों की कमी को बर्दाश्त कर पाएंगे।

गौरतलब है कि पिछले साल जुलाई, अगस्त में पाकिस्तान में बाढ़ ने बहुत ज़्यादा तबाही मचाई थी। इस बाढ़ की चपेट में करीब बीस फीसदी आबादी आई थी। लाखों लोग पलायन के लिए मजबूर हुए थे। पाकिस्तान के दक्षिण में मौजूद कई इलाकों में आज भी पानी भरा हुआ है।   

पूरे पाकिस्तान में खराब हो रहे हालातपाकिस्तान में चरमपंथ के बढ़ते प्रभाव के बीच पिछले कई दशकों से पनप रहा आतंकवाद, लोकतंत्र की जगह तानाशाही, सरकार और सेना के बीच टकराव और सेना का ज़्यादा ताकतवर होना, जैसे कारकों की वजह से पूरे पाकिस्तान में अस्थिरता और अशांति का माहौल है। इसके चलते आए दिन पाकिस्तान में बम धमाके हो रहे हैं, जिसमें पिछले कुछ सालों में हजारों लोग मारे गए हैं। पाकिस्तान में युवा बेरोजगारी और गरीबी का शिकार हैं। पाकिस्तान में पश्चिमी और उत्तरी राज्यों में दशकों से गरीबी और अस्थिरता का माहौल है। इसका असर पूरे पाकिस्तान पर पड़ रहा है। 

दीवालिया होने के कगार पर पाकपाकिस्तान दीवालिया होने की कगार पर खड़ा है। विदेशों से मिल रही मदद भी अब कम होती जा रही है। विदेशी मददगारों का साफतौर पर कहना है कि जब तक पाकिस्तानी सरकार रक्षा पर अपने बजट में कटौती नहीं करेगा, तब तक वे कोई आर्थिक मदद नहीं देंगे। पाकिस्तानी सरकार अगर अपने रक्षा खर्च में कटौतीर नहीं करेगी तो उसे अपनी ही मुद्रा छापनी पड़ेगी, जिससे महंगाई दर और बढ़ेगी। पाकिस्तान में महंगाई दर 20 फीसदी का आंकड़ा छू लिया है। यही हालात रहे आने वाले दो-तीन सालों में सबी चीजों के दाम दोगुने हो जाएंगे।

हर सेकेंड 60 हजार का कर्ज लेता है पाक
पाकिस्तान सरकार हर सेकेंड करीब 60,000 रुपये का कर्ज ले रही है। पाकिस्तान सरकार द्वारा करों के तौर पर वसूले जा रहे हर १०० रुपये में ४० कर्जे के ब्याज के तौर पर चुकाए जा रहे हैं, वहीं ४० रुपये रक्षा पर खर्च हो रहे हैं। वहीं, दस रुपये प्रशासन पर खर्च हो रहे हैं। बाकी बचे दस रुपये ट्रेनिंग, स्वास्थ्य, पोषण, पानी की सप्लाई, जनसंख्या नियोजन, ग्रामीण विकास, विज्ञान, सड़कें, पुल के निर्माण, महिला विकास पर खर्च हो रहे हैं। 

बढ़ रही है बेरोजगारी
पाकिस्तान में लाखों लोगों के हाथ में काम नहीं है। पिछले दस सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ है कि पाकिस्तान में बेरोजगारी की दर लगातार बढ़ रही है। २०१० में बेरोजगारी की दर १४ फीसदी तक पहुंच गई है। जबकि २००९ में यह ७.४ फीसदी थी। एक साल में ही यह दर दो गुना हो गई है।  
२०१० में मारे गए ५ हजार लोगएक आकलन के मुताबिक २०१० के पहले दस महीनों में ही आतंकवादी गतिविधियों, धमाकों में पाकिस्तान के करीब ४७०० लोग मारे गए हैं। साल के अंत तक यह आंकड़ा पांच हजार के आंकड़े को छू रहा है।

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